मरा पड़ा शरीर | विशाल स्वरुप ठाकुर

देश में यूँ तो बहुत गरीब गाँव हैं, लेकिन जिसकी बात में कर रहा हूँ, उसकी बात ही कुछ और है। जहाँ एक ओर अमीरी के लिए होड़ है, तो इन गांवों में देखा जाता है कि गरीबी के लिए रेस लगती है।

फला गाँव के बुड्ढ़े के कुर्ते में चार छेद है तो फलाने के में चार से अधिक होंगे तभी बात बनेगी वर्ना क्या फायदा ऐसी गरीबी  का। अब जिस गाँव की मैं बात कर रहा हूँ वह इस दौड़ में सबसे अव्वल स्थान पर है।

उसके कई कारण हैं, यहाँ सिर्फ आदमी ही गरीब नही है यहाँ के कुत्ते बिल्ली गाय बकरी घोडा तोता मैना अलाना फलाना ढीनकाना सब के सब गरीब हैं। ये गरीब हैं, इसलिए ये गरीब नहीं हैं, ये इस से उभारना ही नहीं चाहते इसलिए गरीब है।

एक मुखिया भी हुआ करता था इस गाँव का, थोड़े ही दिन हुए चल बसा, अब गरीबी का सितम तो देखो। बुड्ढ़े का मर पड़ा शरीर मर ही पड़ा रहा। और तब तक मरा पड़ा रहा जब तक चीटियों ने उसका रसास्वादन नहीं कर लिया।

हां ये देखने योग्य बात है ना कि जहाँ बड़े बड़े जीव गरीब हैं वही छोटे छोटे जीव उन्ही के शरीर के अवशेषों पर अमीरी पा गये। ये जो अमीर हैं यूँ ही अमीर न हो गये, बड़ी मशक्कत और चापलूसी से  इन्होंने अपना रास्ता साफ किया या यूँ कहें की गरीबों को रास्ते से साफ़ किया। लोग इन्हें छोटा छोटा आदमी छोटा आदमी कह कहकर इतना बड़ा करने की साजिश करते हैं की पूछो मत।

येही छोटे लोग बदला लेते हैं । ले रहे हैं और यूँ ही लेते रहेंगे। फिर किसी का मर पड़ा शरीर मरा ही पड़ा रह जायेगा और कुछ चीटियाँ उसी मुखिया की गद्दी को संभालेंगी और संभाल भी रही हैं।

 

– विशाल स्वरुप ठाकुर

Vishal Swaroop Thakur
Vishal Swaroop Thakur

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5 thoughts on “मरा पड़ा शरीर | विशाल स्वरुप ठाकुर

  1. इस वास्तविकता से वाकिफ़ होने के बावजूद, आपकी इस गद्य रचना ने भावविभोर कर दिया। अनन्य कहानी। खूबसूरत कहानी। ❤️

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