Moujoodgi | Mid Night Diary | Vaidehi sharma

मौजूदगी | वैदेही शर्मा

हाँ, यहाँ अब भी सब कुछ है। ठीक वैसा ही जैसा तुम छोड़ गए थे। अगर कुछ तब्दील हुआ तो महज़ वो रात की दिन में तब्दीली और फिर उस दिन की रात में…

ऐसा लगता है कि ये फिज़ाएँ किसी की बन्दिशों में चीख रही हो, लेकिन फिर भी अपने अधूरे मंसूबो को पूरा कर तो रही है। ये घर तुम्हे बहुत याद करता है। जब से तुम गए हो ना, कोई भी उस दरवाज़े को बद सलीके से बन्द नहीं करता। कोई भी कॉफी का वो कप मेज़ पर पड़ा नही छोड़ता और सबसे हैरानी की बात ये कि हमारी कबर्ड अब तक हुबहू जमी है।

कोई उथल पुथल नहीं वहां। यूँ लगता है कि ये घर भी रो पड़ेगा मेरी तरह लेकिन इसको ज़ुबान नहीं, जब कभी अकेले सुकून से बैठती हूँ तो तुम्हारी मौजूदगी महसूस होती है और फिर सुकून इस बात का होता है कि वो मुझे इक सुकून दे जाती हैं।

कभी कभी तो यूँ लगता है कि मैं काश तुम्हे ज़िद पर अड़ कर रोक लेती उस मासूमियत से, जिस पर तुम हर दफा रुक जाया करते थे लेकिन फिर ख्याल आता है कि एक न एक दिन तो वो मासूमियत भी मर ही जाती ना…

भला क्या उम्र भी कभी रुका करती है? तुम्हे याद है? वो रात जब नाराज़ हो कर दूर गए थे मुझसे, मेरे लिए तो वो रात अब भी वही ठहर सी गई है। हर रात में उस रात का हिस्सा बन जाया करती हूँ लेकिन फिर ज़ोर से हँस पड़ती हूँ क्योंकि वो रात फिर तब्दील हो कर दिन बन जाती है।

लेकिन वो रात खत्म नहीं हुआ करती…

 

-वैदेही शर्मा

 

Vaidehi Sharma
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12 thoughts on “मौजूदगी | वैदेही शर्मा

  1. बेहतरीन ढंग से पूरी तरह बेमिसाल शब्दों से बुनी गई कहानी…

  2. एक सच्ची कहानी के बेहद करीब है ये रचना । शब्द एहसास का आइना सा है। कलम की रशनोइ और भी गहरी कीजिए ।

  3. Speechless writing skills ..matlb jitni bhi tarif karu Kam..ek har ek line ka visual mere ankhon k samne jhalak rha Tha…

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