Mirror View

“सो व्हाट द नेक्स्ट ?” छवि ने ममता से पूछा! “हम …कुछ खास नहीं बस एक नया बकरा ….” ममता ने जबाब दिया।
ममता, कितना प्यारा नाम है न लेकिन असल जिंदगी में कहीं अलग.. बिल्कुल नाम से उलट, लड़ाकू नंबर वन, सिगरेट और ड्रिंक की आदी और उसके साथ बाइक राइडिंग में माहिर…

खैर कहानी पर वापस आते हैं, कॉलेज पार्किंग पर बाइक्स के बीच में छवि और ममता अपना अगला शिकार ढूंढ रही थी कि तभी उसकी नज़र वीरेन्द्र पर पड़ी। शोर्ट नेम वीर लेकिन एक नंबर का डरपोक… ममता कुछ सोचती कुछ कहती या कुछ प्लान करती उससे पहले ही छवि ने उससे कहा, “वो देख मिल गया नया बकरा, इसका पप्पू बनाते हैं।”
“आर यू स्योर…” ममता ने बोला लेकिन तब तक छवि वीर की तरफ बढ़ चुकी थी।

“एक्सक्यूज़ मी.. तुम्हरा नाम वीर है न…” छवि ने अचानक वीर के सामने जाकर कहा।
अचानक से छवि के सामने आ जाने पर वीर चौक गया। “हाँ क्यूँ? क्या हुआ?” वीर ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा।
“नहीं नही हुआ कुछ भी नहीं है, बस ऐसे ही.. वो लड़की देख रहे हो जो बाइक पर बैठी है।” छवि ने ममता की तरफ इशारा करते हुए कहा।
“कौन वो.. ममता..” वीर ने ममता की तरफ ऊँगली दिखाते हुए कहा।
“तुम जानते हो उसे?” छवि ने पूंछा।
“कौन नहीं जनता उसे… कॉलेज की हॉट शॉट है वो तो…” वीर ने शर्माते हुए कहा।

“दरअसल बात यह है कि वह तुमसे कुछ कहना चाहती है, शायद अपने दिल का इज़हार करना चाहती है, लेकिन….” छवि ने कुछ देर रुकने के बाद फिर से कहा, “लेकिन वह लड़की है तो पहले नहीं बोल सकती है न…” कहते हुए छवि हँसने लगी।
उसने अपनी हंसी को छुपाते हुए फिर से कहा, “यू नो न शर्म, लिहाज़ एंड ओल…”

“अच्छा यह बात है।” वीर ने बाल ठीक करते हुए कहा। फिर दोनों ममता की तरफ बढ़ गये। वीर तो अपने तरफ आते देख ममता ने ऐसे बर्ताव किया जैसे वह कुछ भी नही जानती हो। वीर उसके पास पहुंचा और उसने हिचकिचाते हुए कुछ कहने की कोशिश की लेकिन कुछ बोल नहीं पाया।

वो कुछ हिम्मत करता उससे पहले ही ममता उसके सामने मुस्कुरा दी और न चाहकर भी वीर के मुंह से निकल गया, “आई लव यू ममता”.

 

“जय हिन्द साहब, ब्रिगेडियर साहब आपको बुला रहे हैं।” बहादुर ने वीर को  आवाज दी।
ममता की तस्वीर को देखते हुए उसका ध्यान टूट गया। उसने अपनी पर्श को जेब में रखा और ब्रिगेडियर के केबिन की तरफ बढ़ गया।
“जय हिन्द सर..” वीर ने एक कड़क आवाज में अपने अफसर को सेल्यूट मारते हुए कहा।
“वीर प्रताप सिंह, कम इन…” ब्रिगेडियर ने बिना उसकी तफ़र देखे उसे नजदीक आने को कहा।

“यहाँ से निकलते ही तुम्हे बेरक 32B के लिए रवाना होना है, कल शाम को ही हम वहां से हीराकुंड के लिए कूंच करेंगे” ब्रिगेडियर ने कहा, “कोई सक.. डिसमिस…”
ब्रिगेडियर के डिसमिस बोलते ही वहां से बाहर आ गया। वहां से निकलते वक़्त उसे ऐसा लगा जैसे वह अपने कॉलेज के प्रिंसिपल के ऑफिस से निकल रहा था।

वह वाकिया वो कैसे भूल सकता था, ममता से अनजाने में ही आई लव यू कहने के बाद वीर की क्लास प्रिंसिपल के ऑफिस में लग गयी थी। दरअसल उसके आई लव यू कहने के बाद ममता ने उसकी शिकायत प्रिंसिपल के ऑफिस में कर दी और अनजाने में बिना किसी कसूर के बेचारा वीर फंस गया।

जिस वक़्त प्रिंसिपल उसे डांट रहे थे, ममता वहीँ बाहर ही खड़ी थी। पता नहीं क्यों पहली बार ममता को खुद की गलती पर अफ़सोस हो रहा था, उसे उस दिन पहली बार खुद की गलती पर वीर के लिए बुरा लग रहा था। लेकिन अब वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।

खैर वीर के ऑफिस से निकलते ही ममता ने उसे कई बार रोकने की कोशिश की लेकिन वीर ने उसकी एक बार भी नहीं सुनी। उसने वीर को कई आवाजें दी लेकिन वीर चुपचाप सीधे बिना बोले बस चले ही जा रहा था कि तभी अचानक आस पास का माहौल बदल गया।

कॉलेज अचानक ही मिलिट्री कैंप में बदल गया। उसने पीछे से आती आवाज की तरफ कर देखा तो बहादुर था। ममता तो आसपास कहीं थी ही नहीं… थी तो सिर्फ उसके ख्यालों में, उसके बेहद ही नजदीक लेकिन उससे दूर, बहुत दूर…

जब कई बार रोकने के बाद भी वीर नहीं रुका तो ममता ने जाकर वीर का हाँथ पकड़ उसे रोकने की कोशिश की लेकिन वह नाकाम रही। कोशिश इतनी जोरदार थी कि ममता अपने आप को संभाल न पाई और दोनों गिर गए। एक दूसरे की बाँहों में, कॉलेज कोरिडोर की फर्श पर नज़रें मिल ही गयी।

लेकिन वीर, वह तो बहुत ही डरा हुआ था। डर उसकी आँखों से निकल कर उसके माथे पर चमक रहा था। वीर को ऐसी हालत में देख ममता को हंसी आ गयी, प्यार की हंसी… ममता को डरा, सहमा सा वीर पसंद आ गया था। उसने पहली बार किसी डरपोक लड़के को देखा था जो डरपोक होने के साथ साथ मासूम और प्यारा भी था।

अब हर रोज़ किसी न किसी बहाने से ममता उसे परेशान करने लगी थी, ममता को वीर को परेशान करना अच्छा लगता था। धीरे-धीरे मजाक में शुरू हुआ सफ़र दोस्ती की डगर में बढ़ गया। पहले तो ममता उसे मजे के लिए परेशान करती थी लेकिन धीरे-धीरे वह उसकी आदत बनता चला गया।

अब तो वीर को भी ममता का परेशान करना जैसे अच्छा लगने लगा था। दोनों साथ ही वक़्त बिताने लगे थे। ममता अब तक यह जान चुकी थी कि वीर को बाइक चलाने से डर लगता है, तो उसने जिद करके वीर को बाइक चलाने के लिए कहा और उसके सामने शर्त रख दी कि अगर वह बाइक चलाएगा तो ममता उसे परेशान करना बंद कर देगी।

कई कोशिशों के बाद ममता ने आखिर वीर को मना ही लिया। खैर वीर ने हैलमेट पहना और बाइक को स्टार्ट किया। उसका हौसला बढ़ाने के लिए ममता भी उसके साथ ही बाइक पर पीछे बैठ गयी। वीर ने बाइक स्टार्ट की, पहले तो वह डर रहा था, लेकिन जैसे जैसे रास्ता गुजरता गया उसका डर दूर हो गया।

बाइक चलाते वक़्त वीर की नज़र बाइक पर लगे साइड मिरर पर गयी जिससे ममता का चेहरा साफ़ नज़र आ रहा था। पहली बार कुछ पल के लिए ही सही ममता के चेहरे की मासूमियत को वीर ने भांप लिया था। उसकी हंसती हुई आँखें, गुलाब की पंखुड़ी से नाजुक उसके शुर्ख गुलाबी होंठ और उड़ते हुए बाल… वह ममता को देखते ही कहीं खो गया था।

वह यह भी भूल गया कि वह बाइक चला रहा था। अचानक ही ब्रेकर से टकराने पर उसका ध्यान टूटा। गाड़ी रुक चुकी थी। “साहब वह रही 32B की बैरक..” बहादुर ने हाँथ से इशारा करते हुए बताया। गाडी के शीशे में अभी भी उसे ममता का हँसता हुआ चेहरा नज़र आ रहा था। वीर भी सोच से बाहर आ चूका था। उसने अपने आपको कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों के बीच में पाया।

खैर बैरक पहुँच कर वीर ने अगले दिन की सारी प्लानिंग कर ली। पूरी टीम को तीन अलग अलग टुकड़ियों में बाँटा गया। तीनो की टुकड़ियों की ज़िम्मेदारी वीर को ही दी गयी। वीर को बेहद ही ज़िम्मेदारी भरी काम सौपा गया था और हो भी क्यूँ न आखिर पूरी टीम में उसके जैसा जांबाज था भी नहीं।

लेकिन जंग के मैदान के वीर और कॉलेज के खेल के मैदान के वीर में जमीन आसमान का फर्क था। कॉलेज का वीर डरपोक और ऊल जुलूल कपड़े पहनने वाला जबकि जंग के मैदान का वीर हिम्मत वाला, सबको एक पल में धूल चटाने वाला और हमेशा डिसिप्लिन में रहने वाला था। इंसान तो वही था फिर कैसे आदतों में इतना फर्क हो सकता था।

दरअसल बीती जिंदगी की किताब के पुराने पन्नों में कई किस्से ऐसे भी थे जिन्हें वीर न जाने कब फाड़कर अगल कर चुका था। उसमे से एक चैप्टर ममता का भी था। बहुत प्यार करता था वह ममता से.. लेकिन आज इस वक़्त इस लम्हें में वह सिर्फ और सिर्फ एक किस्सा बनकर रह गयी थी।

यह तो आप भी जानते हैं और मुझे भी पता है कि जब दो लोग करीब आते हैं तो प्यार हो ही जाता है और दो दिलों का मिलना कोई मुश्किल काम नहीं। इस बात का पता चलते ही, दोनों ने ही अपना इज़हार-ए-इश्क एक दूसरे से कर दिया।

डरपोक ही सही पर ममता को वीर कि मासूमियत भा गयी थी। तो वहीँ दूसरी और वीर को भी ममता के साथ रहने से हिम्मत मिलती थी। भले ही ममता उसे हर दूसरे मिनट में परेशान करती थी लेकिन उसे इस बात का जरा भी बुरा नहीं लगता था।

खैर पूरी प्लानिंग के बाद अगली ही सुबह तडके तीनों टुकडियां प्लानिंग के अनुसार अपने अपने टारगेट पर निकल गयी। पूरे दिन की जद्दोजहद, गोलाबारी और लड़ाई झगडे के बाद आखिर वीर और उसके साथियों ने हीराकुंड की चौकी पर जीत हासिल ही कर ली। कई साथियों की जान गयी तो कई घायल हो गए। वीर को भी कंधे पर एक गोली लग गयी लेकिन हीराकुंड की चौकी पर लहराता तिरंगा देख वीर सबकुछ भूल गया। उसे याद आई तो सिर्फ ममता, उसका प्यार और वह दर्द जो शायद गोलियों से मिलने वाले दर्द से भी ज्यादा भयानक और दर्दनाक था।

हीराकुंड की जंग जीत चुका वीर, असल जिन्दगी की जंग हार चुका था। सन २०११ की वह शाम वीर आज भी नहीं भूला है। हमेशा की ही तरह डरपोक वीर और चुलबुली ममता बाइक पर बैठ दिल्ली हाईकोर्ट के पास से होते हुए प्रगति मैदान जा रहे थे।

कितना अच्छा मौसम था उस शाम का.. दोनों ही बेहद खुश थे। लेकिन शायद वक़्त को ही इनकी ख़ुशी बर्दास्त नहीं हुई। वे अभी हाईकोर्ट के पास से गुजरे ही थे कि तभी अचानक एक बम धमाके ने उसकी रफ़्तार पर ब्रेक लगा दी। २०११ दिल्ली हाईकोर्ट बम ब्लास्ट तो आपको भी याद ही होगा, न जाने कितने ही मासूम लोंगों की जानें गयीं थी।

ममता ने बाइक रोकी और वीर का हाल पूंछा, दोनों ही ठीक थे, किसी को भी रत्ती भर की भी खरोच नहीं आई थी। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने ने मच रही भगदड़ से बचने के लिए घर लौट जाना ही बेहतर समझा। ममता ने बाइक स्टार्ट ही की थी कि तभी दिवार के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज उसे सुनाई दी।

जब ममता ने पास जाकर देखा तो एक मासूम बच्चा मलवे में दबने और अपनी माँ से बिछड़ जाने की वजह से रो रहा था। ममता की कई कोशिशों के बाद वह ममता के पास आ तो गया लेकिन वह अभी भी डरा और सहमा हुआ था। ममता उसे किसी माँ की तरह ही उसे अपने सीने से लगाये हुए थी। वीर ने पहली बार ममता को ऐसे देखा था और शायद आखरी बार भी..

बेकाबू भीड़ से बचाकर ममता जब सड़क पार कर रही थी तो कई बार धक्का लगने की वजह से वह अपने आप को संभाल नहीं पायी और उसका पैर फिसल गया। उसने भीड़ से तो खुद को बचा लिया लेकिन इस बीच सामने से आते तेज रफ़्तार ट्रक को वह नहीं देख पायी। उसने बच्चे को तो बचा लिया लेकिन खुद को नहीं बचा पायी।

देखते ही देखते वीर की आँखों के सामने उसका प्यार यह दुनिया छोड़कर चला गया। चारो और दर्द भरी चींखें, शोर और रोने की आवाजें थी लेकिन फिर भी वीर तन्हा था। उसे कुछ भी सुनाई और दिखाई नहीं दे रहा था। वह रो रहा था लेकिन उसकी आँख में आँसू तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हैं।

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