मेरे कदम | अमृत

अब तो उठकर ये कदम मेरे ठहर जाते है
रास्ते सारे ही तन्हा तेरे घर जाते है,

खौफ है अब हमें अंधेरे का कुछ इतना के
परछाई भी दिख जाए तो सिहर जाते है,

एक इमली का पेड़ जहाँ बोया था हमने
चल आ चाँद आज उस स्याह शहर जाते है,

गुमशुदा और है गुमराह भी लम्हे मेरे
बस बेख्याली में इधर से ये उधर जाते है,

नींद के दरवाजे दस्तक हुई है ख्वाबो की
साथ जिनको लिये मायूस पहर जाते है।

 

-अमृत

 

बेजान रिश्ता अमृत राज
Amrit
Share on FacebookTweet about this on TwitterShare on Google+Share on TumblrShare on LinkedInPin on PinterestEmail this to someone

40total visits,1visits today

Leave a Reply