मेरा पहला प्यार | अदिति चटर्जी

बिना झिझक लोगों से मिलना,
रोज़ नए दोस्त बनाना,
इज़हार-ए-मोहब्बत बिन सोचे कर जाना,
सबकुछ हमेशा से ऐसा नहीं था।

पलके झुकी रह गईं थी,
घबराहट के कितने घूंट उतरे थे,
बेक़रारियों-बेचैनियों का आलम था,
जब पहली दफ़ा वो एहसास हुआ था,
जो कभी था और फिर कभी ना होगा
मेरा पहला प्यार…

उनकी बात ही ख़ास थी,
कमियाँ नज़रअंदाज़ थी,
घंटों करते थे बातें,
हसीन हर मुलाक़ात थी,

खिड़की पे इंतज़ार करना,
हर शाम छुप छुप मिलना,
वो घबराना
वो शरमाना
सब सुहाना लगता था,

जब पहली दफा वो एहसास हुआ था,
जो कभी था और फिर कभी ना होगा,
मेरा पहला प्यार…

घरवालों की हर हिदायत बुरी लगती थी,
ज़िन्दगी बस उस एक शक़्स की नाय़त लगती थी,
‘आग लगा दूँ ज़माने को’
बिन उसके हर चीज़ पराई लगती थी।

‘मेरा प्यार ज़्यादा है’ पे तकरार करना,
उसके फ़ोन रखने की बात पे इंकार करना,
वो नाराज़ होना,
वो मनाना,
हर दर्द मुनासिब लगता था,
जब पहली दफा वो एहसास हुआ था,
जो कभी था और फिर कभी ना होगा,
मेरा पहला प्यार…

 

-अदिति चटर्जी

Aditi Chatterji
Aditi Chatterjee

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1 thought on “मेरा पहला प्यार | अदिति चटर्जी

  1. बहुत सही लिख दिया आपने तो @अदितिजी।।।वैसे एक बात अभी इसे पढ़ा नही सुना है आपकी आवाज में।।।।❤आपके ये लिखे हुए शब्द बोल बनकर मेरे कानों में गूंजे आपकी ही आवाज़ मे।।

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