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मंज़िल | विशाल स्वरुप ठाकुर | ड्रीम्स

पग की चंचलता ने जब मंज़िल को ललकारा है
मंज़िल ने पग को तब तब अपनी ओर पुकारा है

रुके हुए पगों को तो धरती भी बोझ ही माने है
ब्रह्मांड में वसुंधरा को भी कर्मवीर ही प्यारा है।

रुकने वाले से पूछो चलते ही पाने का मतलब
गिरने वाले से पूछो उड़ते ही जाने का मतलब

डूबने वाला ही बता सकता है, तैरने के फायदे
हारा हुआ बतायेगा मंज़िल को पाने का मतलब

अवसान में भी सूर्य, उदय की आस दिलाता है
रोज़ उदय होता है और रोज़ अस्त हो जाता है

घोंसले से उड़ा एक पंछी लौट वहीं पर आएगा
कौन भला उड़ान में घोसला साथ ले जाता है।

रक्त बहा देने वाले गुलाल का मकसद क्या जाने
होली के रंगों में घुले प्यार का मकसद क्या जाने

अविराम नहीं, ग़र जीने का मकसद जान लिया
बिन मकसद के कोई, मकसद के माने क्या जाने।

निशा में चाँद भी अपना रूप बदलता जाता है
अमावस पर भी क्या वह चाँद नहीं कहलाता है

रात में सन्नाटे में जो शीतलता उससे गिरती है
मत भूलो वह आग है, वह जो सूर्य से पाता है।

मंजिल को पाना है तो उस आग को झेलो तुम
अथाह समंदर भिखरा है, गहराई से खेलो तुम

आसमां में उड़ना है तो खोलो अपने पंखो को
या फिर कर पाओ तो आसमान पर फैलो तुम।

 

 

– विशाल ‘स्वरुप’ ठाकुर

 

Vishal Swaroop Thakur
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