मनमर्ज़ियाँ | अमन सिंह

पहले मैं कुछ और सोच रहा था, लेकिन अब कुछ और सोच रहा हूँ.. पर यह सोचना भी कितना मुश्किल है कि ऐसा क्या सोच रहा हूँ कि जिसके लिए इतना सोचना पड़ रहा है। इस मन की हरक़तें कहाँ किसी को समझ आती है। यह मन चला मन बस अपने ही मन से चलता रहता है।

कभी किसी चक्कर में फसा रहता है, कभी किसी ख्वाहिश के पीछे.. किसी भी तरह के समझौते से बिल्कुल परहेज़ है इसे, इस दुनिया की किसी भी बंदिश का इस पर कोई असर नहीं होता है।

यह मन है मेरे यार बस अपने ही मन की करता है। कभी इस दिल की जमीन रूखी ही रह जाती है तो कभी उम्मीदों की ढेर सारी बारिश.. न जाने कितने ही वार सहता है यह प्यार के, न जाने कितनी ही बार हारता है लेकिन कभी भी साजिशें करना कम नहीं करता है।

हारता है, गिरता भी है पर हर बार हिम्मत के टुकड़ों को बटोर के, दबे पाँव चलते चलते, इस दुनिया से किसी चोर की तरह छुपकर अपनी मन्मर्ज़िया करता रहता है।

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