मानव नहीं मैं पेड़ हूँ | धर्मेंद्र सिंह

मानव नहीं ‘मैं पेड़ हूँ’
अभी बूढ़ा नहीं, अधेड़ हूँ।

अभी तो बौर आया है,
अभी तो सावन आया है,
अरे! ये क्या? कुछ लोग आए हैं,
कुछ औजार लाए हैं,
मालिक भी साथ आया है,
दोपहर अभी हुई नहीं,
सो दूर तक उसकी छाया है।

मेरे बगल में जो बबूल का पेड़ है!
पुख्ता, ताकतवर और…
मेरी ही तरह अधेड़ है।
मेरा दोस्त है वो बचपन का,
आज उसी के बारे में बातें हो रही हैं,
आज उसी का दिन है
उसका ‘आखिरी दिन’
मैं ‘आम’ हूँ
शायद इसीलिए मुझे छोड़ा गया
मेरे ‘खास’ को जाना होगा
मैं स्तब्ध हूँ, अचल और नि:शस्त्र!

हम गुट नहीं बना सकते
इंसानों की तरह
मेरा बस नहीं है मेरे साथी की मौत पर
या फिर ये इंसानों की मौत है
क्या कर सकता हूँ मैं?
कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं।

बबूल में हिम्मत है,
वो फिर अंकुरित होगा
मेरे दामन में छनकर आती हुई धूप में,
मेरे मरने का इंतजार करता हुआ
और तब मैं उसे छेड़ते हुए कहूँगा,

‘मानव नहीं मैं पेड़ हूँ
अभी बूढ़ा नहीं, अधेड़ हूँ।’
और वो मुस्कुरा देगा,
अपनी आंखों में नमी लिये।

 

-धर्मेंद्र सिंह

 

Dharmendra Singh
Dharmendra Singh

329total visits,1visits today

Leave a Reply