Makaan | Mid Night Diary | Yash Sharma

मकाँ | यश शर्मा

गर आओगी इस मकाँ कभी
तो इसे उजड़ा हुआ पाओगी
वीराना कमरा भी होगा एक
पर अब वो कमरा भी क्या

उस कमरे में जा के देखना
वो चादर की सिलवटें
और कुछ तस्वीरें तुम्हारी
पर अब वो तस्वीरें भी क्या

कोने में पड़ा वो टेबल भी दिखेगा
वो चाय का कप आज भी आधा है
तिरे होठों के निशां उसपे अब भी ताज़ा हैं
पर अब वो निशां भी क्या

वहीं टेबल पर एक ऐश ट्रे भी होगा
जिसमे वो आधी जली सिगरेट है
जिसे तुमने बुझाने की कोशिश की थी
पर अब वो सिगरेट भी क्या

उसी टेबल पर एक डायरी भी होगी
उसके उधड़े सफ़हों के बीच
कुछ पुराने ख़त भी होंगे तेरे
पर अब वो ख़त भी क्या

टेबल से उठ कर बरामदे की ओर आना
तो दीवारों पर वो जौन के शे’र दिखेंगे
जो तुमने बड़े ही प्यार से लिक्खे थे
पर अब वो शे’र भी क्या

बरामदे में कुछ गमले भी दिखेंगे
जिनमें वो नर्गिस के फूल मुरझा गए हैं
जो हमने बड़ी शिद्दत से लगाए थे
पर अब वो फूल भी क्या

वहीं उसी बरामदे में
वो कुर्सी भी पड़ी है
और शायद मैं भी मिलूं
पर अब मैं भी क्या

 

-यश शर्मा

 

Yash Sharma
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