Main, Wo Aur Anhoni | Mid Night Diary | Piyush Bhalse

मैं, वो और अनहोनी | पियूष भालसे

मैं-अनहोनी होगी शायद
वो- अनहोनी? कैसी अनहोनी?
मैं-अनहोनी जैसी । ।
वो- क्या?
मैं- जिसका सुनकर पलको की साँसे रुक जाये,वो झपकना बंद कर दे।
मुँह खुला का खुला रह जाये।
शब्द का दम भी गले में घुट जाए जो कुछ निकलने को कर रहे थे।
आसपास का मंजर भी सुना पड़ जाये जैसे समशान घाट पे होता है।
ठीक वैसी ही अनहोनी।
वो-क्या बक रहे हो।
मैं- हाँ सुनो वो दूर उस टीले पे कुछ कुत्ते रो रहे है। सुनाई दिया?
वो-बस करो यार भाई,चलो पेग मारते है
मैं – ओके
(2 पेग के बाद)

मैं- मुझे अस्पताल की बू आ रही है।
वो- भाई तू मेन्टल हो गया है।चढ़ रही है तुझे 2 ही मारे अभी तो।
मैं- आदमी मर जाता है, पर चिता ज़िंदा रहती है।
धधक कर जलती है। बस जलती है
2 दिनों तक जिंदा होती है वो
फिर धीरे धीरे कुछ ठंडी होकर
वो भी मर जाती है।
और कुत्ते रोते है।
एक अनहोनी की दस्तक देने के लिए।

(उस रात “मैं” को सच में दारू हो गई थी। वो सो गया वही पे कुछ चंद मिनट में। और “वो” अपने बिस्तर पे लेटे लेटे घड़ी की हजारो टिक टिक के साथ बिना पलक झपके, बिना कुछ बोले पंखे को लगातार देख रहा था।
शायद वो अब उस अनहोनी के बारे में सोच रहा था जिसको उस समय उसने एक मजाक में टाल दिया था।
3 बज चुके थे। “वो” ने बालकनी में जाकर एक सिगरेट जलाई और लंबा कश खीच कर ध्यान से उन कुत्तो का राग सुन रहा था।
“वो” अब उस अनहोनी की गहराई में उतर रहा था जो बात कुछ वक्त पहले उसे मजाक लग रही थी। “वो अब सोने के लिए फिर से अपने बिस्तर पे आ गया।
अनहोनी का हल्का सा दर्द उसके सीने में उठा
जो धीरे धीरे कुछ बढ़ता जा रहा था,वो चाहकर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था।
उधर कुत्तो का रोना और तेज हो गया था
शायद उनके परिवार के कुछ और लोग भी रोने आ गए हो।और रोकर अनहोनी का स्वागत कर रहे हो।
“वो” शायद उठना चाह रहा था
कुछ बोलना चाह रहा था
लाख कोशिशो के बाद भी वो कुछ नहीं कर पाया।
कमरे में एक चुप्पी सी हो गई
कुत्ते भी अनहोनी का स्वागत कर चुके थे
और वो की आँखे अब पंखे पे टिक कर शांत हो गई।
शब्द मुँह के सारे मर गए है।
वो की साँसे भी उस अनहोनी के साथ दूर ऊपर उस आसमान में चली गई।
ज़िन्दगी सच में एक मजाक बन गई
ज़िन्दगी सच में एक मजाक बन गई।

-पियूष भालसे

 

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