मैं तकलीफें सह लूंगा | धर्मेंद्र सिंह | #अनलॉकदइमोशन

अंबर से बदरी छट जाये, फूलों की रंगत उड़ जाये
जो रात न तन्हा कट पाये, पास मेरे आ जाना तुम
बिस्तर पे तुम सो जाना, मैं सोफे पे ही रह लूंगा
तुम आराम को फरमाना, मैं तकलीफें सह लूंगा

जब सर्द हवाएं ठिठुराएँ, कुछ बूँदे बारिश बन जाएँ
उन शामों की यादें तड़पाएँ, झील किनारे आना तुम
कहना मुझसे, न पहचाना! मैं कोई मुसाफ़िर कह दूंगा
तुम आराम को फरमाना, मैं तकलीफें सह लूंगा

हँसते हँसते जब रुक जाओ, चलते चलते जब थक जाओ
बहते बहते जब जम जाओ, थोड़ा सा मुस्काना तुम
पत्थर से पत्थर टकराना, मैं बन चिंगारी लौटूंगा
तुम आराम को फरमाना, मैं तकलीफें सह लूंगा

पता नहीं कल का मुझको, मैं कोई तारा बन जाऊं
चमक चांदनी रातों में, शायद तुमको न दिख पाऊँ
खोल के खिड़की पिंजरे की, पंखों को फैलाना तुम
तुम चिड़िया बनके उड़ जाना, मैं सूरज बनके चमकूँगा
तुम आराम को फरमाना, मैं तकलीफें सह लूंगा

गर कोई तुम्हें दिल दे बैठे, सब कुछ अपना वो कह बैठे
खुद दर्द तुम्हारा सह बैठे, बाहों में उसकी जाना तुम
आँखों में उसकी खो जाना, मैं बिन देखे ही रह लूंगा
तुम आराम को फरमाना, मैं तकलीफें सह लूंगा

 

 

– धर्मेंद्र सिंह

 

Dharmendra Singh
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