Main Aaj Bhi | Mid Night Diary | Harsh Singh

मैं आज भी | हर्ष सिंह

हर शब जब जब माहताब की और
देखता हूं
मैं खुद को तेरी यादों की कैद
में देखता हूँ

वो हर किस्सा वो हर लम्हा जो
तेरे संग गुज़रा था
मैं फिर उन्ही किस्सों को
लम्हो को ख्वाब की तरह देखता
हूँ

हर ख्वाब में यही एक ख्वाईश
होती है कि काश ये लम्हे फिर
से दोहराए जाए
फुरकत के पलों से दूर
वस्ल-ए-उल्फत की कहानी की
लीखी जाए

वो एक एक पल शबो शब जब मैं
तेरे साथ गुफ्तगु किया करता
था
फिर से वही गुफ्तगू वही पल
तेरे साथ बिताना चाहता हूँ

गम-ए-हिज़्र का ज़िक्र न हो
एक दूसरे से बिछड़ने की फ़िक्र
न हो
बस तेरे और मेरे दरमियाँ
मोहब्बत ही मोहब्बत हो
पर ये सब ख्वाब-ए-बेताबिर है
मैं ये जानता हूँ

पर ये तखयुल-ए-मरासिम सोचकर
ही आहिस्ते आहिस्ते
मुुुसकुरा जाता हूँ

मुसलसल इसी ख्वाब में रहता
हूँ कि तुम किसी रोज़ तो वापस
आओगी
पर ये खुदा ही जाने तुम कब
आओगी
पर मेरी निगाहे तो अब हमेेशा
तेरे इंतेज़ार में मुन्तज़िर
है

तुम मशगूल हो गई अपनी ज़िंदगी
मे जुद-फ़रामोश बन के
और मैं आज भी तेरा इंतेज़ार
करता हूँ
जफ़ा-ए-इश्क़ को हल्की तबस्सुम
के
साथ अपना बनाता हूँ

मैं आज भी तेरी यादों की कैद
में खुद को रखता हूँ

 

-हर्ष सिंह 

 

Harsh Singh
Harsh Singh

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