माँ ‘द अनकंडीशनल लव’ | अमन सिंह

ऑफिस से आने के बाद रोज़ रोज़ खाना बनाने की जद्दोजहेद और अकेलापन अब जैसे थम सी गयी जिंदगी का हिस्सा बन गये हैं। पिछली रात की बात है, लगभग ११ बज गये थे और मैं, हर रात की तरह गैस पर चढ़ी कढ़ाई से उठ रहे धुएं से लड़ रहा था। सब्जी एक बार फिर जल गयी थी, हर रोज़ की तरह…

राख होते होते हुए सब्जी को बचा लेने के चक्कर में भाँप से हंथेली भी जल गयी, उठते धुएं से आँखों में होती चुभन कब आँसू बनकर बाहर निकली पता ही नहीं चला। आँखों में चुभन, हथेली में जलन और भूंख से खराब होती हालत..

बस आँसू बन माँ की याद छलक गयी इन पलकों से, बचपन में अगर खाना पसंद नहीं आता तो, खाने से मना कर देता और फिर माँ मुझे मनाते हुए, पूरे घर में पीछे पीछे थाली लेकर दौड़ती रहती। जब माँ साथ होती है तो हमे लगता है कि वह हर बात पर हमे टोकती है, और जब माँ साथ नही है तो ऐसा लगता है कि कोई रोकने वाला नहीं हैं।

चोट मुझे लगती तो दर्द उसकी आँखों में दिखता, जीत मेरी होती और खुशियाँ वह मनाती, और फिर यह जान कि छोड़कर जाना है उसे, तो दरवाजे के पीछे छिपकर आँसू बहाती… माँ तू नहीं होगी तो बता, कौन करेगा मेरी परवाह…!!

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