लोविंग शैडो | अमन सिंह | #एंडलेसजर्नीऑफ़ मेमोरीज

“राज, तू तो यहीं पास में ही रहता है न, और तुझे रात में कोई प्रॉब्लम भी नहीं…” कविता ने आर्डर प्लेस करते वक़्त कहा, “बट यू नो न मुझे थोड़ा दूर से आना पड़ता है और ऊपर से मम्मा…” उसने राज की तरफ देखा और फिर चुप हो गयी।

“यार कवि तू बोल तो ठीक रही है… लेकिन तुझे रुमर्स के बारे में पता ही है…”, राजीव ने हिचकिचाते हुए कहा।
“अरे यार तू भी कहाँ पुराने जमाने के लोगों की तरह बातें कर रहा है…” कविता ने मजाक बनाते हुए कहा।

राजीव ने कुछ नहीं कहा और फिर दोनों पिज़्ज़ा खाने में बिजी हो गए। पिज़्ज़ा खाते वक़्त राजीव के होंठों के पास थोड़ा सा सौस लग गया, जिसे देखकर कविता ने उसे पोछने का इशारा किया लेकिन राजीव को कुछ समझ नहीं आया। उसने कई बार कोशिश की लेकिन वह हर बार नाकाम रहा। इस बार कविता से नहीं रहा गया तो उसने खुद ही अपने हांथों से उसके होंठों के पास लगे सौस को पोंछा। राजीव को कविता का हर छोटी छोटी बात में उसका ख्याल रखना अच्छा लगता था। वह कहीं न कहीं मन ही मन उसे पसंद भी करता था लेकिन….

जब थोड़ी देर हो गयी तो राजीव ने ख़ामोशी का सिलसिला तोड़ते हुए पूंछा, “अच्छा ये रुमर्स में कितनी सच्चाई है…?”
लेकिन कविता की ओर से उसे कोई जवाब नहीं मिला।
राजीव ने फिर से कहा, “आई मीन, मैं इन बातों को मानता तो नहीं हूँ लेकिन कहीं न कहीं यह बातें सच लगती हैं।”

“अरे छोड़ न यार… रहने दे… मैं देखती हूँ कुछ… कुंदन से बात करती हूँ…”
(राजीव मन में सोचते हुए, “शिट यार कवि को कैसे मना कर सकता हूँ, मैं तो उसे पसंद करता हूँ… लेकिन अगर वो रुमर्स सच हुए देन…”)
सोचने के कुछ बाद उसने कविता से कहा, “नहीं नहीं लेट मी ट्राई समथिंग… कुछ करता हूँ मैं…”

“सो नाइस ऑफ़ यू… थैंक्स…!!” कविता ने अपना हाथ राजीव के हाथ पर रखते हुए कहा, और एक हल्की सी मुस्कान वार के लिए छोड़ दी। फिर क्या था, बिचारा प्यार का मारा राजीव घायल हो गया। जवाब में उसने भी हल्के से मुस्कुरा दिया।
राजीव फिर से अपने ख्यालों में (यार आज तो दिन बन गया।) फिर दोनों हँसते मुस्कुराते डोमिनोस के आउटलेट से बाहर आ गये।

मैनेजर के केबिन से निकलते ही राजीव ने कविता को खुश खबरी सुनाई कि मैनेजर मान गया है और वो उसकी जगह पर नाईट शिफ्ट में काम कर सकता है। यह सुनते ही कविता ने उसे सबके सामने गले से लगा लिया, राजीव कविता के यूँ ही अचानक गले लग जाने से खुश था लेकिन साथ ही थोड़ा परेशान भी।

अगले दिन से उनसे नाईट शिफ्ट में जाना शुरू कर दिया। अब उसकी रातें दिन और दिन रातों में बदल चुके थे। शुरू शुरू में उसे डर लगता था लेकिन यह सोच कि लोग क्या कहेंगे वह अपना डर किसी से ज़ाहिर नहीं करता, खास कर कविता से… खैर काम करते करते कई रातें गुजर गयीं। अब उसका मन भी लगने लगा था और धीरे-धीरे डर भी लगभग घायब ही हो गया था।

एक रात की बात है, राजीव ऑफिस में अकेला काम कर रहा था, कि तभी अचानक उसके बगल ही सीट का कंप्यूटर अचानक चालू हो गया, जिससे एक पल को वह डर ही गया। किसी तरह उसने काम करने में मन लगाने की कोशिश की लेकिन कई बार की कोशिश के बावजूद भी वह नाकाम रहा। उसका मन भी अब काम में नहीं लग रहा था तो वह ऑफिस के टैरिस पर जाकर सिगरेट पीने लगा।

वह सिगरेट अभी पी ही रहा था कि तभी उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई खड़ा है, जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। वह अभी घूमा ही था कि तभी उसे एक लड़की की अवाज सुनाई दी। उसने फिर पीछे देखा तो अपने नज़दीक एक लड़की को खड़ा देख वो डर गया।

वह कुछ कहता, कुछ समझता इससे पहले ही उस लड़की ने उसे सिगरेट पीने के लिए मांगी और फिर थोड़ी देर बाद वहाँ से चली गयी। उसे पहली बार देखा था राजीव ने ऑफिस में… थोड़ी देर बाद राजीव ने अपने आपको संभाला और फिर नीचे चला गया। इस वाकिये के बारे में उसने किसी से कुछ नहीं कहा।

अगले दिन राजीव फिर से टाइम पर ऑफिस पहुँच गया। वह जैसे ही ऑफिस में अपनी सीट के पास पहुंचा तो उसने देखा कि पिछली रात मिली वह लड़की उसके बगल वाली सीट पर बैठी है। उसने उसे एक नज़र देखा और फिर जाकर अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। बगल में लड़की बैठी हो तो भला किसका मन काम करने में लगेगा, वैसा ही राजीव के साथ हुआ। कुछ देर काम करने का बहाना करके उसने उस लड़की को चोर नज़रों से देखा, सफ़ेद रंग का कुर्ता, लम्बे काले बाल, हल्के नीले रंग की आँखें और कीबोर्ड पर धीरे धीरे चलती उंगलियाँ, वाकई कितनी मासूम लग रही थी वो….

“हे… हाई… कैसे हो?.. पहचाना…?” उस लड़की ने अचानक ही राजीव की तरफ देखते हुए कहा ।
राजीव नज़रें चुराते हुए, “ह…हा…हाई, तुम कल रात…”
“हाँ मैं ही थी, कल रात… वैसे मेरे सरे दोस्त मुझे नविका कहते हैं..” उस लड़की ने राजीव की बात को काटते हुए कहा।
“ओह्ह्ह… अच्छा…” राजीव ने चैन की साँस लेते हुए कहा और साथ ही पूँछा, “वैसे कब ज्वाइन किया तुमने ?”
“बस कल रात को ही..” नविका ने जवाब दिया ।
“वैसे नाईट शिफ्ट….” राजीव ने कुछ सोचते हुए कहा।

“हाँ…” नविका ने राजीव की बात को बीच में काटते हुए कहा और आगे बोला, “वो क्या है न.. मुझे तारों से बाते करना बेहद पसंद है और यह रात की ख़ामोशी एक अजीब सा सुकून देती है।”

रातें गुजरीं, मुलाकाते बढीं और दोनों एक दुसरे का साथ पसंद करने लगे । अब राजीव कविता को भूल नाविका को याद रखने लगा था। देर से ही सही लेकिन उनकी बातें अब ऑफिस की डेस्क से निकलकर कैफ़े की बेंच तक पहुँच गयीं। वो खुद भी नहीं जानते थे वह कहाँ तक इस दोस्ती का सफ़र तय कर चुके थे । कोहरे की चादर में लिपटी रात में, चाँद की हल्की सी रोशनी में, खुले आस्मां के नीचे, ठंडी हवा में दोनों मिलकर तारों से ढेरों बातें करते थे।

“तुम अक्सर सफ़ेद कपड़ों में ही क्यूँ रहती हो…? कोई खास वजह?” राजीव ने यूँ ही एक रात काम के बाद ऑफिस के टैरिस पर बात करते वक़्त नविका से पूंछा ।
नविका ने किसी शरारती बच्चे की तरह उसके कंधें पर हल्का सा मुक्का मारते हुए कहा, “अरे बुद्धू इतना भी नहीं समझते, यह मेरा पसंदीदा रंग है… यही तो एक रंग है जिस पर सारे रंग आसानी से चढ़ जाते हैं।”

“ह्म्म्म.. वैसे तुम वाकई इस रंग में खूबसूरत लगती हो…” राजीव ने नविका की तारीफ करते हुए कहा।
“अच्छा.. सच में.. या फिर मुझे इम्प्रेस करने के लिए कह रहे हो?” नविका ने अपने पुराने शरारती अंदाज में कहा।

“तुम्हें क्या लगता है?” राजीव ने नविका को जवाब देने के बदले उसी से पूँछ लिया।
नविका ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि वह शर्मा गयी। जहाँ एक और राजीव नविका के करीब आ रहा था वहीँ दूसरी ओर वह कविता से भी अपनी दोस्ती को बरकरार रखने की जद्दोजहेद में लगा था। कई कोशिशों के बाद आखिर एक दिन राजीव ने नविका का जिक्र कविता से कर ही दिया। दोनों ने ढेरों बातें की, नविका ऐसी है, नविका वैसी है, नविका यह, नविका वह.. न जाने क्या क्या?

सारी बातों सुनने के बाद कविता ने राजीव से कहा, “मैं तुम्हारे लिए खुश हूँ कि कम से कम तुम्हें कोई तो मिल गया… लेकिन एक बात बताओ…?”
“क्या?” राजीव ने कविता से पूंछा।
“लेकिन यार इस नाम की किसी बंदी के बारे में मैंने पहले कभी नहीं सुना…. और पिछले दिनों में कोई नई जोइनिंग भीं नही हुई है, तो…” कविता ने अपनी बात पूरी की।

“क्या मतलब है तुम्हारा… मतलब नाविका….” राजीव कुछ कहता उससे पहले ही कविता ने उसे टोका और बात को बदलते हुए कहा, वैसे तू अपने दिल की बात उसे कब बता रहा है?”
“वैसे सोचा तो है.. अगले सोमवार को ही… बस यह दो दिनों की छुटियाँ जल्दी से खत्म हो जाये। अच्छा ठीक है, फिर बात करता हूँ।” राजीव ने कहा और फोन काट दिया। कविता खुश थी लेकिन शक का एक बीज उसके दिमाग में अपनी पकड़ बना चुका था।

खैर दो दिन या रातें जो भी कहो गुजरे, एक लम्बे इन्तजार के बाद सोमवार का तय दिन ओह सॉरी दिन नहीं रात, आ गयी जिस दिन राजीव ने अपने दिल के हाल का जिक्र नविका से करने के लिए सोचा था। उस रात नविका हर रात से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। जब दिल की बात हो तो भला काम करने में कैसे मन लगता, खैर किसी तरह वक़्त गुरने का इन्तजार करते हुए राजीव ने कई घंडे बिता दिया।

जब दोनों टैरेस पर गए तो राजीव ने नविका से कहा, “ नविका मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन पहले तुम वादा करो तुम नाराज़ नहीं होगी।”
नविका में इशारे से हामी भर दी। राजीव ने देर न करते हुए, अपने कोट के जेब में रखें गुलाब को निकाल कर आने घुटनों पर झुक कर कहा, “ नाविका… आई…” इससे पहले वह कुछ कहता राजीव का फोन बजा, स्क्रीन पर कविता का नाम था।

(इतनी रात गए कविता का फ़ोन..) राजीव ने मन में सोचा और फिर नविका की तरफ़ देखा, नविका ने इन्तजार करने का इशारा किया और राजीव उससे कुछ दूरी पर आ गया और कविता का फोन उठा लिया।
“हेल्लो… क्या हुआ? इतनी रात को फोन किया?” राजीव एक साथ कई सवाल कविता से किये।

“देखो मैं जो कहने जा रही हूँ उसे बड़े ही आराम से सुनना और फिर कुछ कहना…” कविता ने बड़े ही आराम से राजीव् को समझाते हुए कहा।
“ठीक है…”
“जब तुमने नविका के बारे में बताया तो मैं बहुत खुश हुई लेकिन मुझे थोड़ा शक हुआ था न, नविका के बारे में… तो मैंने तुम्हें बिना बताये नविका के बारे में पता किया…लेकिन…” कविता कहते कहते रुक गयी।
“लेकिन क्या…?” राजीव ने थोड़ा परेशान होते हुए कहा। बात करते वक़्त उसकी पीठ नविका की तरफ थी।

“अब जो मैं कहने जा रही हूँ उसे इत्मीनान से सुनना…. दरअसल जब मैंने पता किया तो मुझे पता चला कि नविका नाम की एक लड़की आज से कई साल पहले अपनी ही कम्पनी में नाईट सिफत में जॉब करती थी और एक रात पार्टी के वक़्त अनजाने में गिरकर उसकी मौत हो गयी थी। सच मानों या झूठ लेकिन यही सच है….”

कविता की बात सुनने के बाद राजीव जैसे सक्ते में आ गया था, उसने कुछ नहीं कहा। कविता अब तक फ़ोन काट चुकी थी, राजीव ने बिना कुछ कहे चुपचाप पीछे मुडकर देखा, पीछे देख वह दांग रह गया। वहाँ कोई नहीं था, उसने नविका को खूब धुंध, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। वह वापस अपनी सीट पर गया तो उसने देखा, नविका का पसंदीदा स्कार्फ उसकी सीट पर रखा था।

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