लव स्टोरी | विशाल स्वरुप ठाकुर | टीचर’स डे स्पेशल

कुछ किताबों और कुछ चौक्स और एक डस्टर लिए तुम अपनी क्लास को पढ़ाकर निकल रही थी और ये वो समय था, जब मैं पहली बार तुम्हे देख रहा था। टीचर तो मैं नया था लेकिन अब फिर स्टूडेंट हो जाना चाहता था, तुम्हारा स्टूडेंट। पहली बार देखकर बात करने का डर और बिना बात किये पूरा दिन बिताने की मजबूरी, ये दो बाते नदी के दो किनारों की तरह मेरे जेहन में रुकी हुई थी जिन किनारों के बीचों बीच तुम बह रही थी सिर्फ तुम।

मेरे जेहन में अवसाद सा जम गया था, जिसमे तुमसे मिलकर भी न मिलने का मलाल था और तुम्हे देख लेने की ख़ुशी, साथ ही तुम्हारी पहली नज़र की चुभन जो आँखों पर नहीं बल्कि दिल की कई परतों तक चुभ चुकी थी। ये मेरी जिन्दगी में चल रहे शनिचर का ख़ात्मा था और एक नये मंगल की शुरुआत।

तुम्हारी थोड़ी सी झलक में बहुत कुछ मिल चूका था मुझे – रातों की बैचेनी, दिन का इंतजार।

शुरुआत के दो तीन दिन तो तुम मेरे लिए अजनबी थी और मैं तुम्हारे लिए अनजान। आज मेरे स्कूल का तीसरा दिन था और तुम उस आठ खम्बों के गलियारे के तीसरे कमरे से निकल रही थी और मैं दुसरे कमरे से। तुम्हारा हाथ हमेशा की तरह कॉपी किताब और चौक डस्टर को सभालता हुआ डगमगा रहा था। और ये वो समय था जब हमारी आँखे नहीं बल्कि हम टकरा गये थे।

बिलकुल दुसरे और तीसरे कमरे की बींचोबीच। यह बात इसलिये यादगार नहीं की हम पहली बार टकरा गये बल्कि इसलिए की तीसरे कमरे के चौथी क्लास के बच्चे शायद इसी बात का इंतजार कर रहे थे। तुमने पहली बार मुझे जो शब्द कहा था वह था – सॉरी।

लेकिन समय की विडंबना यह रही की मैं अपनी चुप्पी को तोड़ इट्स ओके भी नहीं कह पाया था। हां अक्सर यही होता है जब कोई खूबसूरत चेहरा आपसे टकरा जाये।

मैं उसे सिर्फ अब से जनता था और वो न जाने मुझे कब से जानती थी। यह न उसने कभी बताया और न कभी मैं पूछ ही पाया। बात यह थी कि वो एक लड़की थी और मैं 20 साल की उम्र में पहुंचकर जिंदगी में पहली दफा किसी लड़की से टकरा रहा था। यह मेरी बदकिस्मती कहिये या उसकी किस्मत, की उसके प्यार में जो लड़का अभी पड़ना शुरू हुआ है वो अभी ठीक ठाक रूप से सुधरा हुआ है और स्कूल का परमानेंट तो नहीं गेस्ट टीचर था, और अब जी चाहता था कि दिल्ली की पढाई छोड़ यहीं परमानेंट हो जाऊँ।

लेकिन दिक्कत यह नहीं थी। दिक्कत वह थी जो आने वाली थी और जिस दिक्कत का जिक्र मैं नहीं कर सकता और करना चाहता भी नहीं क्योकि उसको पसंद नहीं है क्योकि अब ना ही वो टीचर रह गयी है और ना ही मैं।

न वो परमानेंट हो पाई ना मैं गया फिर से वहाँ।

पर अब जब भी बात होती है तो वो टीचर की तरह ही बर्ताव करती है और मैं टीचर होकर स्टूडेंट की तरह।

 

-विशाल स्वरुप ठाकुर

 

Vishal Swaroop Thakur
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3 thoughts on “लव स्टोरी | विशाल स्वरुप ठाकुर | टीचर’स डे स्पेशल

  1. आपकी कहानी पसंद आई, शब्दों की विविधता और तीखे उनमें मोड़ वाकई मजेदार हैं। आगे के लिए शुभकामनाएं।

  2. Good story,carrying an element of suspense and sucessed in arresting the attention of the reader till the end

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