लव शीकोलोजी | अमन सिंह | #एंडलेसजर्नीऑफ़ मेमोरीज

पूरी लिस्ट देखने के बाद भी खुद का नाम न मिलने पर ध्रुव झल्ला सा गया। चिलचिलाती धूप, पसीने से गीले कपडे और कॉलेज का शोर, किसी को भी गुस्सा दिला सकता है। साथ ही अगर आपका सिलेक्शन बोर्ड पर नाम न हो तो फिर कहने ही क्या.. ध्रुव अभी अफ़सोस मना ही रहा था कि एक लड़की ने आकर उसे भीड़ से बाहर खीच लिया। ऐसा करने से उसका गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुँच गया।

“ध्रुव कश्यप..” उस अनजान लड़की ने कहा।
ध्रुव ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि यह सोचने लगा कि कॉलेज का पहला दिन, किसी को जानता भी नहीं, फिर इसे मेरा नाम कैसे पता?
“क्या हुआ? यही सोंच रहे हो न कि मुझे तुम्हारा नाम कैसे पता चला?” कुछ देर्रुकने के बाद उसने कहा, “तुम्हारे स्कोर कार्ड से..” उसने ध्रुव का स्कोर कार्ड उसे दिखाया।
“हम्म्म्म… शायद भीड़ में गिर गया होगा।” ध्रुव ने जवाब दिया।
“वैसे टॉप पर आने वाले ऐसे मुँह नहीं बनाते” उस लड़की ने ध्रुव से कहा और कोरिडोर की तरफ इशारा करते हुए आगे कहा, “सेक्शन ए… उधर है चलें..”

दोनों साथ ही आगे बढ़ गये। ध्रुव चुपचाप चलता रहा। “सैकॉल्जी… कोई खास इंटरेस्ट..?” उस लड़की ने पूंछा।
“नहीं, पढने में सिंपल है, बस…” ध्रुव ने बिना उसकी तरफ देखते हुए कहा और साथ ही पूंछा “और तुम..”
“सेम पिंच… सैकॉल्जी.. लेकिन सैकॉल्जी इतनी भी सिंपल नहीं..”
“फिर?” ध्रुव ने बात आगे बड़ाई।
“मुझे चेहरे पढना पसंद है….”
ध्रुव ने उसकी तरफ देखा और फिर दोनों आगे बढ़ गये। “क्लास ?” इस बार ध्रुव ने सेक्शन ए के सामने पहुँच कर पूंछा।
“नहीं अभी मेरी दूसरी क्लास है.. मिलते हैं सैकॉल्जी की क्लास में… ” वह अनजान लड़की इतना कह कर यहाँ से चली गयी।

उस अनजान लड़की को जाते देख, ध्रुव ने कुछ सोचा और फिर लेक्चर हाल में चला गया। पहला लेक्चर कब बीत गया, उसे पता ही नहीं चला। एक के बाद दूसरा और फिर दूसरे के बाद तीसरा लेक्चर भी बीत ही गया। तीन लेक्चर लगातार अटेंड करके थक चुका ध्रुव, लेक्चर हाल से निकलकर, कॉलेज के बाहर कार स्टैंड पर अपनी कार की तरफ बढ़ गया।

सिगरेट की बुरी आदत उसे गाड़ी तक खीच ही लायी। गाड़ी के पास पहुँच उसने फटाफट एक सिगरेट जलाई और धुएं के छल्ले उड़ने लगा। पहली सिगरेट ख़त्म होने के बाद उसने दूसरी सिगरेट भी जला ली। उसने दूसरी सिगरेट के दो ही कश मारे थे कि उसे याद आया, अगला लेक्चर सैकॉल्जी का ही है। उसने बिना ख़त्म किये ही सिगरेट फ़ेंक दी और लेक्चर हाल की ओर दौड़ पड़ा। वैसे उसे सैकॉल्जी में कोई इंटरेस्ट नही था लेकिन, वह अनजान लड़की, उसकी पहचान, उसका नाम…

दौड़ने से ध्रुव के बाल और कपड़े भिखर गए। लेक्चर हाल में घुसने से पहले ही उसने अपने कपड़े और बाल ठीक किये साथ ही, माउथ फ्रेशनर से अपने मुंह का मिजाज बदला। वह लेक्चर हाल पहुँच तो गया लेकिन तब तक प्रोफेशेर आ चुके थे।
“एस..” एक भरी आवाज में ध्रुव को टोका।
“सर, ध्रुव कश्यप… सैकॉल्जी स्टूडेंट…” धुर्व ने हड़बड़ी में कहा।
“आप लेट हैं..” प्रोफेसर ने अपनी पगड़ी सँभालते हुए कहा।
“बात सर मैं टॉप रैंक होल्डर हूँ…” ध्रुव अपनी बात ख़त्म करता उससे पहले ही सरदार जी (प्रोफेसर) बोल पड़े “ताहि प्रॉब्लम है आजकल का, खुद तो लेट आते हैं और ऊपर से क्लास भी डिस्टर्ब करते है।”
“बाहर निकल जाओ अभी…” उन्होंने गुस्सा करते हुए कहा।

वह अनजान लड़की ध्रुव को ही देख रही थी। ध्रुव अभी लेक्चर हाल से बाहर आ ही रहा था कि उसे प्रोफेसर की भरी आवाज फिर से सुनाई दी, “आज पहला दिन है तो सब अपना इंट्रोडक्शन देंगे।”

क्लास से बाहर निकाल दिया गया लेकिन यह बहुत अच्छा मौका था, उस लड़की का नाम जानने का.. इसलिए वह छिपकर गेट के पास खड़ा हो गया। लगभग बीस मिनट बाद जब लड़की का नंबर आया तो, ध्रुव ने अपने कान गेट के और नजदीक कर लिए.. वह गेट के पास छिपकर खड़ा ही, वह लड़की कुछ बोलती इससे पहले ही उस कड़क सरदार ने उसे देख लिया।

प्रोफेसर के देखते ही ध्रुव के चेहरे का रंग उड़ गया। प्रोफेसर ने आँखें चढ़ाकर उससे इशारे में पूंछा “क्या?”
ध्रुव ने कोई जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर खड़े रहने के बाद प्रोफेसर ने कहा, “चलो अन्दर आ जाओ, अगली बार से वक़्त पर आना। “
ध्रुव चुपचाप आकार पडली ही सीट पर बैठ गया। वह अनजान लड़की अभी भी सबसे आगे ब्लैक बोर्ड के पास खडी थी। उसने अपना इंट्रोडक्शन शुरू किया।

“माय नेम इज तारा शर्मा….” उसने आगे क्या बोला, ध्रुव ने ध्यान नहीं दिया बल्कि उस अजनबी लड़की का नाम सुनते ही वह कहीं खो सा गया। ध्रुव-तारा… एक साथ कितने अच्छे लगते हैं। वापस जाते वक़्त ध्रुव और तारा की नज़रें मिलीं, दोनों ने एक दुसरे को देखा और तारा मुस्कुराकर अपनी सीट पर वापस आ गयी।

“आईये जनाब अब आप भी अपना इंट्रोडक्शन दे दीजिये…” प्रोफेसर ने बड़े ही अजीब तरीके से कहा। ध्रुव अभी भी कहीं गुम था। वह लगातार तारा को देख रहा था। उसे देख सभी हंसने लगे। खुद तारा को भी हँसी आ गयी। खैर जबतक आगे कुछ होता, क्लास ख़त्म होने की बेल बज गयी। ध्रुव क्लास से बाहर निकल ही रहा था कि वह तारा से टकरा गया। दोनों के एक बार फिर से एक दुसरे को देखा, दोनों हँसे और फिर से साथ आगे बढ़ गये।

“घर या हॉस्टल..” ध्रुव ने पूंछा।
“पी. जी.” तारा ने जवाब दिया “और तुम?”
“न घर, न पी.जी. और न ही हॉस्टल…” ध्रुव ने स्टाइल मारते हुए कहा।
“मतलब…” तारा ने उसे सवाली नज़रों से देखा।
“दरअसल पापा का अच्छा खासा बिज़नेस है, तो हर दूसरे शहर में हमारा फार्म हाउस है।”
अब तक दोनों कॉलेज के बाहर स्टैंड तक पहुँच गये। “मेरी कार से चलें…” ध्रुव ने चाभी दिखाते हुए कहा।
“नहीं आज नही…” तारा ने मना कर दिया और बस स्टैंड की तरफ बढ़ गयी।

ध्रुव अपनी गाड़ी में बैठ सिगरेट पीने लगा, तारा अभी भी बस स्टैंड पर खडी थी। इस बीच दोनों की नज़रें कई बार मिलीं। थोड़ी देर बाद तारा खुद ही ध्रुव इ गाड़ी की तरफ बढ़ चली। वह गाड़ी के पास गयी और चुपचाप ध्रुव के बगल में बैठ गयी। ध्रुव ने गाड़ी स्टार्ट की और फिर दोनों एक नए सफ़र पर निकल गए।

गर्मी के मौसम में कब धूप आ जाये, कब बारिश कुछ कहा नहीं जा सकता। ध्रुव और तारा अभी कुछ दूर ही पहुंचे थे कि धुप के बीच बारिश की हल्की बौछार आ गयी। खुली कार की वजह से बारिश की बूंदें शीदे उनके चेहरे पर पड़ी। खैर बारिश आई और चली गयी।
“तुमने बताया नहीं, तुम्हारा पी. जी. किधर है।” ध्रुव ने एक सिगरेट निकलते हुए कहा।
“शास्त्री चौक, गली नंबर सात.. वैसे सिगरेट पीना अच्छी बात नहीं और एक लड़की के सामने तो बिल्कुल भी नहीं..” तारा ने कार के शीशे में देखते हुए जवाब दिया।
ध्रुव ने न चाहकर भी जलाई हुई सिगरेट फेंक दी।
“गुड बॉय..” तारा ने हँसते हुए कहा और ताली बजाई।
“थैंक यू…” ध्रुव इससे पहले कुछ कहता, तारा ने उसे टोकते हुए बोला, “थैंक्स तुम्हें नहीं मुझे बोलना चाहिए तुम्हें, मुझे यहाँ तक छोड़ने के लिए.. बस आगे मोड़ पर..”

२ मिनट बाद तारा गाड़ी से बाहर थी। तारा बाय बोल कर जाने लगी कि तभी ध्रुव ने उसे पीछे से टोका, “कम से कम एक कप चाय की पिला दो..”
“आज नहीं, फिर कभी..” तारा हलक सा मुस्कुराते हुए इतना कहकर वहाँ से चली गयी। ध्रुव ने अपने बालों पर हाँथ फेरा और गाड़ी मोड़कर वापस आने के लिए मुड़ गया। उस दिन ध्रुव अकेला वापस नहीं आया था, कुछ तो था जो उसके साथ वापस लौट आया था, जो उसे भी पता नहीं था। दिन बीता और अगले दिन दोनों फिर से सरदार की सैकॉल्जी की क्लास में थे।

“हाऊ बोअरिंग यार..” ध्रुव ने हल्का सा फुसफुसाते हुए कहा।
“सैकॉल्जी पढने की नहीं समझने की चीज है…” तारा ने उसे समझाया।
“मतलब….”
तारा उसकी बात का कोई जवाब देती उससे पहले ही सरदार ने उन्हें बात करते देख लिया और क्लास से बाहर निकाल दिया।
“थैंक गॉड..” ध्रुव ने क्लास से बाहर निकलते ही रहत की साँस लेते हुए कहा, “वैसे तुम कुछ कह रही थी, मैं समझा नहीं..” उसने आगे कहा।
“मेरा मतलब था कि सैकॉल्जी को पढों नही, समझो… ” तारा ने जवाब दिया।
“वैसे तुम क्या समझती हो…” ध्रुव ने पूँछा।
“अभी तक तलाश जारी थी, लेकिन अब लगता है… तलाश पूरी हो गयी है..” तारा ने ध्रुव की आँखों में देखते हुए कहा। इतना कहकर वह वहाँ से जाने लगी, लेकिन तभी अचानक उसने मुड़कर कहा, “मुझे किसी का चेहरा पढना है…” उसकी आँखों का इशारा ध्रुव की ओर था।

वक़्त बीतते देर नहीं लगती है, और तब तो बिल्कुल भीं नहीं जब आप किसी के साथ हों। ध्रुव और तारा दोनों ही एक दूसरे के साथ खुश थे। कभी बस, कभी कार, कभी कहीं घूमना तो कभी नोट्स, अब उनके पास ढेरों बहाने थे, एक साथ रहने के… देखते ही देखते लगभग पूरा सेमेस्टर बीत गया, तब उन्हें अंदाजा हुआ कि उनकी दोस्ती को छह महीने हो चुके हैं।

अब ध्रुव का सिगरेट पीना भी बहुत कम हो गया था। जब भी तारा उसके साथ होती तब तो उसका ध्यान कहीं और जाता ही नहीं। ऐसे ही एक शाम दोनों शास्त्री चौक के पास की झील के किनारे बैठे बातें कर रहे थे कि तभी तारा उससे पूछ बैठी, “क्या बात है? आज कल तुम सिगरेट नहीं पीते?”
ध्रुव ने हँसकर कहा, “तुम साथ रहती हो तो सिगरेट पीने का सवाल ही नहीं रहता, नशा तो यूँ ही….” वह कहते कहते चुप हो गया।
“क्या? क्या बोला तुमने…” तारा ने थोड़े शरारती अंदाज में कहा।
“कुछ भी तो नहीं, अब किसी लड़की को सिगरेट की वजह से नाराज़ भी तो नहीं किया जा सकता, न..” ध्रुव ने बात को सँभालते हुए कहा।
“ओये कहीं मुझे इम्प्रेस करने का ट्राई तो नहीं कर रहे…” तारा ने हँसते हुए कहा।
पहले तो ध्रुव ने कुछ नहीं कहा लेकिन फिर कुछ देर बाद एक पत्थर पानी में मारते हए कहा, “जरुरत है, क्या?”

पानी में पत्थर पड़ते ही जैसे जान आ गयी। तारा ने बड़ी ही सादगी से ध्रुव को देखा और फिर दोनों ही वापस लौट गए। वह शाम भी झील की ख़ामोशी की तरह कहीं खो गयी, लेकिन अपने पीछे एक बेचैन कर देने वाला एहसास छोड़ गयी। अब तो लगभग हर शाम शास्त्री चौक की झील के किनारे बीतती। अगर ऐसा नहीं हो तो, दोनों किसी न किसी लम्बी ड्राइव पर गए होते।

अब हर शाम दोनों साथ ही गुजारते, अलग होते तो सिर्फ उतनी देर के लिए जितनी देर उन्हें सोना होता। लेकिन नींद आती ही किसे थी, दोनों ओर तो करवटें बदलने का सिलसिला शुरू हो चुका था। लेकिन इस राज का खुलासा कौन करे? यह अभी तय नहीं हुआ था। कुछ दिन और बीते, कुछ शामें और गुजरीं और फिर एक शाम ध्रुव ने तारा से कहा, “आओ तुम्हें एक नयी जगह घुमाने ले चलता हूँ।”
“कहाँ?” तारा ने पूँछा।
“पता चल जायेगा, गाड़ी में बैठो तो सही…” ध्रुव ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा।
तारा चुपचाप गाड़ी में बैठ गयी, और दोनों एक बार फिर एक सफ़र के लिए रवाना हो गए।

जगह तो जानी पहचानी सी लग रही थी, लेकिन रास्ता नया सा था। कई बार खुद को समझाने के बाद भी जब तारा से नहीं रहा गया तो उसने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए ध्रुव से पूछ लिया, “मुझे ऐसा लग रहा है, कि यह जगह कुछ जानी पहचानी सी है, लेकिन रास्ता कुछ अजीब सा है।”
“बस दो मिनट रुको, हम पहुँचने ही वाले है।” ध्रुव ने गाड़ी का शीशा ठीक करते हुए कहा।
थोड़ी देर बाद जब गाड़ी रुकी तो तारा ने देखा, वह तो कोई नयी जगह नहीं है, यह वही जगह थी, जहाँ वह हर शाम का अपना वक़्त साथ बिताते थे, वही शास्त्री चौक की झील वही जगह…
गाड़ी से उतरते ही तारा ने ध्रुव से पूँछा, “तुम तो कह रहे थे कि किसी नयी जगह चल रहे हैं, लेकिन यह तो…”
वह इससे पहले आगे कुछ बोलती, ध्रुव ने उसे टोकते हुए कहा, “तुम सवाल बहुत करती हो, कुछ पल के लिए सिर्फ वैसा ही करो जैसा मैं कह रहा हूँ।”

उसने तारा का हाथ पकड़ा और दोनों झील के नजदीक पहुँच गए। तारा अभी ध्रुव को बड़ी उमीदों से देख रही रही थी कि वह अब कुछ बोले लेकिन ध्रुव, वह तो किसी और ही ख्याल में खोया था।
“यार प्लीज अब बता भी दो, क्या बात है…” तारा ने बेचैन होते हुए कहा।
“खुद ही पढ़ लो, तुम्हें तो चेहरे पढना पसंद हैं, न…” ध्रुव ने यूँ ही इधर उधर इशारे करते हुए कहा।
“यार प्लीज यह गोलमोल बाते करना बंद करो..” तारा ने किसी बच्चे की तरह नाराज़ होते हुए कहा।
“अच्छा ठीक है, बस कुछ देर रुको, मैं अभी आया…” ध्रुव ने कहा और वहाँ से कुछ दूरी पर चला गया।

तारा उसे वहीँ से खड़े खड़े देख रही थी। वहीँ दूसरी तरफ ध्रुव ने फटाफट एक सिगरेट निकालकर फूंकी और फिर माउथ फ्रेशनर इस्तमाल करके तारा के पास आ गया। तारा ने कुछ बोलना चाहा लेकिन उससे पहले की ध्रुव ने उससे आखें बंद करने को कहा। जब तारा ने मना किया तो ध्रुव ने फिर से कहा, “बस एक बार प्लीज….”
उसने इतना ही कहा, कि तारा ने अपनी आँखें बंद कर ली। पल गुजरते ही ध्रुव ने अपनी बात शुरू की, “बहुत दिनों बाद तुम्हारे सामने सिगरेट पी, इसके लिए सॉरी लेकिन जरुरी था। अब मुद्दे पर आता हूँ…” तारा की आँखें अभी भी बंद थीं।

“कुछ दिन पहले तुमने पूँछा था कि मैंने सिगरेट पीना क्यूँ बंद कर दी, दरअसल बात यह है कि जब जब तुम्हारी आँखों में देखता हूँ तो एक नशा सा चढ़ जाता है। जिसके सामने यह सिगरेट भी फीकी पड़ जाती है। ख्वाहिश बस इतनी सी है कि मैं चाहता हूँ कि यह नशा कभी न उतरे, ता उम्र मैं इस नशे में डूबा रहना चाहता हूँ। अपनी जिन्दगी तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।”

तारा ने अपनी आँखें खोली तो देखा कि ध्रुव उसके सामने एक अंगूठी लिए अपने घुटनों पर बैठा था। ध्रुव को देखते ही तारा की आँखों से आँसू छलक गए।

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