लॉस्ट वर्ड्स लॉस्ट मी | अमन सिंह

कब से तुम्हें एक बात कहना चाहता हूँ पर जब भी तुम सामने होती हो तो शब्द ही खो जाते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे धूप के न रहने पर साया, टुकड़ों में बट चुके वक़्त के न जाने कितने ही हिस्सों में सिर्फ तुम्हारा ही जिक्र होता है, लेकिन तुम्हें क्या पता? इस बात से अनजान तुम मुझे तन्हां कर जाती हो बिल्कुल पेड़ से टूटे उस पत्ते की तरह जो रहता तो पेड़ के आसपास ही है लेकिन उसका कोई वजूद नहीं होता। यही दिल की एक बात कहना चाहता हूँ तुमसे, एक अर्से से.. पर.. पता नहीं क्यों, शब्दों को कभी जोड़ ही नहीं पाया, कभी कह ही नहीं पाया जो तुमसे कहना चाहता हूँ। पर अब और नहीं, इन अल्फाजों को मैं इस कागज़ पर उतार दिल का सारा बोझ कम कर देना चाहता हूँ।

थक चूका हूँ खुद से बातें करते करते और अब ये झूट दिल को और बहला नहीं सकता, अब तुम्हारी यादें नहीं तुम्हारी जरूरत है मुझे, सुन लो मैंने कह दिया जो मुझे कहना था। हाँ, मुझे… तुम्हारी जरूरत है। बहुत से ख्याल यूँ ही जहन में दम तोड़ देते हैं। यूँ तुमसे दूर चले जाना आसान नहीं था पर क्या करता जो मैंने कहना चाहा तुमने सुना भीं नहीं, लेकिन वक़्त की तरह इस स्याही को अब जाया न होने दूंगा, रोज यूँ ही तुम्हें एक बेनाम ख़त लिखूंगा, उन आधूरी बातों के साथ जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पता।

तुम मिलो जो फुर्सत में कभी तो बाटूंगा तुम्हारे साथ कुछ अधूरी बातें, कुछ अधूरी चाहते जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पता।

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