Lakeerein | Mid Night Diary | Maninder Singh

लकीरें | मनिंदर सिंह

कुछ लकीरें खींचते खींचते
कागज़ पर एक तस्वीर उभर आई

लगा कोई अपना है पहचान वाला
बिछड़ा हुआ घमखवार कोई

उसकी आँखों में अपना माज़ी
दिख रहा था मुझे

उसकी खुशबू गुज़रे वक़्त का
एहसास दिला रही थी

उसके वुजूद से मुक्म्मल लग
रहा था जहां सारा

बहुत देर सोचता रहा देखता
रहा में उसको

और अचानक वो तस्वीर बोल उठी

सुनी सुनाई लग रही थी आवाज़
उसकी

बातों में गुज़रे माज़ी की
झलक दिख रही थी

घंटों सुनता रहा में अपनी
कहानी उस से

वो भूले बचपन के किस्से
सुना रही थी मुझे

तेरा ज़िक्र आते ही आंखें भर
आई उसकी

कुछ ऐसी बारिश हुई कि सब
लकीरें धुन्दला गई

में खामोश बस देखता रहा उसे

यह सोच कर कि आंसू पोंछ दूं
उसके

में उसकी हस्ती ही मिटा
बैठा

आज भी उसी कागज़ को देखता
रहता हूँ

ढढूंता रहता हूँ अक्स कोई

शायद फिर कोई बिछड़ा यार मिल
जाए कहीं

सुनाए मुझको भूली कुई मेरी
कहानी कोई

 

 

-मनिंदर सिंह

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