Lakadi Ka Radio | Mid Night Diary | Anubhav Kush

लकड़ी का रेडिओ | अनुभव कुश

दीवाली……! दीवाली सिर्फ दीवाली नहीं बल्कि एक ओवरडोज होता है। सबकुछ तो होता है इसमें – सफाई, दीवारों में नए रंग, बहुत सारी झालरें और पटाखे भी।

उन दिनों मेरी उम्र थी बारह साल, क्लास 6 में पढ़ने वाला बस एक बारह साल का बच्चा। दीवाली को बस एक हफ़्ता बाकी था, मोहल्ले के बाकी घरों की तरह मेरे घर में भी साफ-सफाई चालू हो चुकी थी।

पहले दिन अंदर वाले कमरे की, दूसरे दिन बाहर वाले कमरे की और फिर रसोईघर भी तीसरे साफ कर दिया गया। घर ज़्यादा बड़ा नहीं था लेकिन घर में सामान हद से ज़्यादा था इसी वजह से एक कमरे का सामान दूसरे कमरे में शिफ़्ट करके सफाई कि जाती है। इस दौरान वक़्त लगना तो लाज़मी था।

और अब बारी थी स्टोर रूम की। यूं तो मुझे साफ-सफाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। पर स्टोर रूम की सफाई के दौरान मैं वहीं मौजूद रहता था। और इसके पीछे थी एक वजह जो की बारह साल के बच्चे लिए बहुत बड़ी और रोमांचित करने वाली थी। एक रेडियो, चौबीस साल पुराना एक लकड़ी का बड़ा सा रेडियो।

जो कि हर साल साफ करके वापस वहीं स्टोर रूम के अंधेरे में रख दिया जाता था मानो किसी म्यूज़ियम में रखा जा रहा हो। हर साल मैं कहता था कि इसको बाहर ही रहने दो मुझे इसको चला कर देखना है कैसा बजता है ये।

पर घर का सबसे छोटा था ना इसीलिए मेरी बातो का कोई मोल नहीं था। ख़ैर इस बार भी मेरी इच्छा यही थी कि रेडियो बाहर ही रख दिया जाए। और इस बार बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसा मैं चाहता था।

रेडियो वापस अंधेरे स्टोर रूम की चारदीवारी के अंदर नहीं रखा गया। शायद भगवान भी इस बार मेरे साथ था। मैंने झट से रेडियो उठाया और ले जा कर ऊपर के कमरे में रख दिया। तुरंत उसका स्लेटी रंग का धूल लगा हुआ तार लिया ताकि मैं इसे बजाकर देख सकूं।

अरे ये क्या…..तार बिजली के बोर्ड तक पहुंच ही नहीं रहा था। मैनें पास में रखी मेज अपनी तरफ खीच ली और रेडियो उस पर रख दिया, इस बार तार आराम से बोर्ड तक पहुंच रहा था।

मैनें तार को सॉकेट में लगाया और जैसे ही मैनें स्विच ऑन किया रेडियो के आगे की तरफ एक पीली रंग की लाइट जल गई जिससे लाल रंग की सुई जो रेडियो चैनल की फ्रीक्वेंसी बताती है चमक उठी।

अब मैनें रेडियो का चैनल सेट करने वाली बटन घुमाई लेकिन कुछ सुनाई ना दिया। अब आवाज़ बढ़ाने वाली बटन घुमाई। इस बार एक आवाज़ तो आई थी लेकिन वो ना ही किसी गाने की आवाज़ थी ना ही किसी रेडियो में बोलने वाले आदमी की।

वो तो बस जब रेडियो सिग्नल नहीं पकड़ता तब आवाज़ आती है वैसी ही आवाज़ थी। पूरा एक घंटा रेडियो में लगी बटनों से जूझता रहा। अब मैं थक हार कर वापस नीचे आ गया।

रेडियो मेरे दिमाग में घर कर चुका था ना खाने में मन लग रहा था ना पढ़ाई में। ‘ना जाने क्यों नहीं चल रहा है ये रेडियो’ यही सोचा करता था मैं हर समय। मेरे दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यूं ना मैं ही इसे ठीक करूं।

हां अब मैनें ठान लिया था कि मैं इसे ठीक कर के ही रहूंगा। आखिर क्यूं ना आता ये ख्याल मेरे दिमाग में, अब तक छोटे मोटे बिजली के काम तो मैं कर ही लेता था। बस फिर क्या था एक नए जोश और एक पेंचकस साथ पहुंच गया। जल्दी से सारे पेंच खोले और ऊपर का कवर हटाया।

अंदर देखा तो रेडियो के पुर्जों पर चौबीस सालो की धूल जमा थी। मैनें एक कपड़े से सारी धूल साफ की। अब मेरे सामने रेडियो के सारे पुर्जों का जाल था मानों अगर मैं कोई छोटी सी चीटी जैसा होता तो वो मेरे लिए भुलभुलैया होता। ख़ैर, मैने छानबीन करना शुरू किया।

पहले तो कुछ ना दिखा लेकिन ध्यान से देखने पर कुछ तार टूटे हुए मिले। मैने अपने अंदाज़ से तारों के रंग के अनुसार उनको जोड़ दिया, ‘हां…अब शायद चल जाएगा’ इसी उम्मीद में मैनें फिर से स्विच ऑन किया।

लेकिन इस बार भी कोई फायदा नहीं हुआ। इस बार भी रेडियो जीवंत ना हुआ। फिर से मैनें एक गहरी सांस भरी और लग गया इस बीमार रेडियो की मर्ज़ तलाशने। कुछ देर देखने के बाद एक तार और मिला जो टूटा था और इस रंग का कोई और तार ना मिला जिससे इसे जोड़ सकूं।

मुझे बिल्कुल समझ ही नहीं आ रहा को इसे कहां लगाऊं। थोड़ी ताकझांक के बाद तार के पास एक सिंबल बना दिखा जो कि देखने पर आजकल के वाई-फाई के जैसा लग रहा था। फिर समझ आया कि ये तार एंटीना के लिए है। मैं भागते हुए नीचे गया और एक लंबा सा तार ले आया। उसको मैनें रेडियो के तार से जोड़ा और उस तार को एंटीने में लगा दिया।

इस बार मैने स्विच ऑन करने से पहले मैनें हाथ जोड़कर और आंखे बंद करके भगवान से प्रार्थना की कि प्लीज़ इस बार तो रेडियो ज़रूर चला देना। अब मैनें स्विच ऑन किया।

लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी। मैं थक हार कर रेडियो के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया और रेडियो पर ही माथा टेक लिया। गुस्से से फ्रीक्वेंसी वाली बटन ज़ोर से पूरी की पूरी घुमा दी। ऐसा करते ही एक आवाज़ तो अाई थी।पहले मैने ध्यान नहीं दिया गुस्सा जो था मैं इतना। कुछ तो सुनाई दिया था। मै बिल्कुल आराम से उस बटन को वापस उल्टा घुमाने लगा।

फिर से आवाज़ अाई, जैसे ही दोबारा आवाज़ सुनी मैं कुर्सी छोड़ कर उछलने लगा। बहुत खुश था मैं। लेकिन जब आवाज़ कान में गई और मैने थोड़ा ध्यान दिया आवाज़ पर तो थोड़ी अलग सी आवाज़ थी ये, मेरी तो समझ के बाहर थी इस रेडियो चैनल की आवाज़।

मैने अपना पूरा दिन इस रेडियो को सुधारने में लगा दिया था। अपनी पूरी समझ और ताकत लगा दी थी मैने इस रेडियो में। और मेरे इस लकड़ी के बड़े से चौबीस साल पुराने रेडियो ने दूर देश की फ्रीक्वेंसी पकड़ी थी, जी हां, दूर देश की। चाइनीज चैनल था वो। चाइनीज गाने बज रहे थे उसमें।

उस दिन एक सबक तो मिल गया था मुझे कि “मेहनत का फल हमेशा मीठा नहीं होता, कभी कभी फल सुरीला भी होता है और सुर की कोई भाषा नहीं होती”

 

-अनुभव कुश

Anubhav Kush
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