लड़का होना | अदिति चटर्जी | #मीटू

मुस्कुराता मौज में, वो रमता इधर उधर,
पुचकारते थे लोग उसको, वो जाता था जिधर,
छोटी साड़ी पहनाकर बिंदी उसको लगाती थी
लड़की सा सजा उसको माँ खूब दुलार जताती थी।

वो नान्हा बच्चा धीरे धीरे वक़्त की सीढ़ी चढ़ गया
छोड़ कर बचकानी हरकतें सारी, वो बच्चे से ‘लड़का’ बन गया।

अब रो नहीं सकता था वो
क्योंकि ‘लड़के कभी रोते नहीं’
घुटता रहा खुद मे बस ये साबित करने को
तकलीफ़ हो कितनी भी ‘लड़के कमज़ोर होते नहीं’।

रंग पसन्दीदा पूछने पर वो लड़का बहुत शर्माता था,
उठ जाते सवाल चरित्र पर, कहता जो, रंग गुलाबी भाता था।

हर वक़्त उसको थी अब ये बात सता रही,
दोस्तों की तो आ गई, क्यूँ मेरी मूँछ नहीं आ रही।

एक एक कर जिम्मेदारियों का बोझ उस पर बढ़ गया,
उफ़्फ़! भी न कर सका वो, मर्दानगी भारी पड़ गया।

यूं ज़िम्मेदारियाँ लेना, घुटना और कभी ना रोना,
शायद बहुत मुश्किल होता होगा ‘लड़का’ होना।

 

-अदिति चटर्जी 

 

Aditi Chatterjee
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