क्यों | भावना त्रिपाठी

अग़र मुहब्बत नहीं तो निहारते हो क्यों,
अगर मोहब्बत है तो छिपाते हो क्यों।

मैं भी तो यही कहती हूं कि मुझे मोहब्बत नहीं तुमसे,
फिर भी हर रात मेरे ख्वाबों में आते हो क्यों?

तेरे पास का हर कागज़, हर दीवार, वाकिफ़ है मुझसे,
हर जगह मेरा नाम लिखते हो क्यों,मिटाते हो क्यों?

प्यार न होने का दावा भी करते हो पर फिर भी,
बगल से गुज़रते वक़्त नज़रें पीछे घुमाते हो क्यों?

देखी है वह तस्वीर अपनी, जो बनाई है तुमने मेरी,सिर्फ मुझे बनाकर अपने हाथों से, खुद को मुसव्विर बताते हो क्यों?

अगर मुसव्विर हो तुम तो फ़क़त,
मुझे ही कागज़ पर बनाते हो क्यों?

जवाब इन सवालों का अगली बार दूंगा,
हर बार यूं ही टाल कर, बार- बार मिलने बुलाते हो क्यों।

 

-भावना त्रिपाठी

 

Bhavna Tripathi
Bhavna Tripathi

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13 thoughts on “क्यों | भावना त्रिपाठी

  1. आपकी कविता के कुछ शब्दों और पंक्तियों को आवृत्ति देकर पढ़ा जाए तो आपकी लेखनी के वाक भावों को भी बखूबी समझा जा सकता है। वियोग श्रृंगार रस और शांत रस में यह एक बेहद सुंदर रचना है।

  2. मजा आ गया जी मुझे अपनी कहानी लग रही
    धन्यवाद जी

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