कुछ मेरी भी | जय वर्मा

मैं एक मूर्तिकार हूं। दिन भर पत्थर की शिलाओं पर खट् खट् खट् खट् खट्।
यही मेरा काम है।

मैं, तरह तरह के महापुरुषों देवों देवियों को गढ़ने वाला अपना भाग्य नहीं गढ़ पाता हूं।

कभी कभी मेरा मन भी, पता नहीं क्यों ?, अजीब सी साहित्यिकता से भर जाता है। यद्यपि मेरा साहित्य से , अध्ययन से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी।

पता नहीं ये सोच साहित्य की है या सनक की। पर यदि स्वाभाविक अनुभूतियों, प्रबल मानसिक भावों और संवेदनशील विचार साहित्य के गुण हैं तो ये साहित्य ही है।

जरुरी नहीं कि हर साहित्यिक रचनायें लोकहित लोक कल्याण निहित ही हों।
वो यदि भावनाओं को उद्देलित कराने में और पाठकों को विचार करवाने में सक्षम हैं तो भी संभवतया साहित्य ही है।

ये देव प्रतिमायें, ये अद्भुत अवतारों के प्रतीक रुप सामान्य से , हमीं जैसे लगने वाले महापुरुषों से अधिक क्यों क्रय किए जाते हैं? या…

तमाम प्रकार की अन्य कलायें जैसे चित्रकला, साहित्य, नृत्य, गायन, संगीत आदि से मूर्तिकला की पूछ कम क्यों है।ये हीन क्यों है? या…

इस कला का पारंगत कोई अब तक भी राष्ट्ररत्न क्यों नहीं हुआ?

ऐसी और भी कई कलाऐं हैं जिनमें श्रम और हुनर बहुत लगता है। हर कोई ऐरा-गैरा इनके निर्वाहन में सक्षम भी नहीं है, फिर भी इनकी महत्ता कम क्यों ?

प्रश्न उठे हैं। पर ऐसा नहीं है कि बस प्रश्न ही उठे हों। उत्तरों का खाका भी मस्तिष्क में खिंचा पड़ा है। वैचारिक शक्ति के सहारे मैं इनका कारण भी भलिभांति जानता हूं।

जो कला जितने बड़े जनसमूह को जितनी प्रबलता से प्रभावित करती है वो उतनी ही महत्वपूर्ण एवं यशस्वी हो जाती है। जिन कलाओं से एक सीमित दायरा या चंद लोग प्रभावित होते हैं , वे कलायें जीविकोपार्जन का साधन मात्र रह जातीं हैं।

देव प्रतिमाएं सर्वाधिक बिकतीं हैं। जबकि 95% लोग मानेंगे कि उन्हें कभी ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हुआ, और न ही दर्शन हुये। ईश्वरीय शक्ति की कल्पना और कामना या कहें लाभ की संभावना या कहें लाभ की इच्छा मानव में प्रबल होती है।

जन्म लेकर जा चुके महापुरुष , महाशक्तियों से लैस नहीं होते अतः उनके प्रति घोर श्रद्धा हो भी तो लाभ के आसार नहीं होते। और लेन देन मय ये संसार।

अजन्मों की मूर्तियां व्यक्तिगत लाभो और मांगों की खातिर ही घर घर में पूजी जातीं हैं। आप मुझे काम करते देखिए। आइये।

मेरी मूर्तियों की सुघड़ता, सौंदर्य देखिए, मेरे छैनी हथौड़ी की नपी तुली चोटों को देखिए।

आपको अवश्य ही प्रतीत होगा कि मैं भी एक तरह से अद्भुत हूं, अलग हूं। जिस प्रकार हर शख्स साहित्य की एक पंक्ति नहीं लिख सकता। जैसे हर कोई गीत के दो बोल ठीक से नहीं गा सकता।

जिस प्रकार हर किसी के बस का नहीं तबले पर दो थाप सही दे देना। जैसे हर कोई नाच का एक चरण सही नहीं कर सकता। जिस प्रकार कैनवास पर हर कोई एक कूंची सही नहीं फेर सकता।

ठीक वैसे ही हर कोई पत्थर पर छैनी का एक सटीक प्रहार नहीं कर सकता।
फिर कहां है इस कला में कमतरी। फिर भी इस कला के उत्पाद मात्र बैचे और खरीदे जाते हैं । मूर्ति कार को कोई नहीं पूछता।

कारण हमारा ध्यान लाभ की चीजों पर बहुत जाता है।  हम कथा पढ़ते हैं कथाकार का नाम नहीं देखते। गीत सुनते है गायक , गीतकार को भूल जाते हैं। फिल्म देखते है निर्देशक का नाम नहीं जानते।

हम बस लाभ केन्द्रित हैं।

 

जयहिंन्द वर्मा ” जय “

 

Jay Verma
Jay Verma

510total visits,1visits today

Leave a Reply