कोई और है | प्रशान्त शर्मा

हर दम जिस से मुआमला है मेरा, उसका सिलसिला कोई और है।

हर्फ़ जैसा बिखरा पड़ा है वजूद मेरा, उसके जज़्बात कोई और है।
मैं क़र्ज़ में दबा बेठा हु जिसके, उसका मोल कोई और है।

जो उसका आफताब बने बैठा है, वो कोई और है।
मैं हूँ इंतज़ार में जिसके वो शाम कोई और है।

अलफ़ाज़ बने बेठा हूँ में, पर उसकी ग़ज़ल कोई और है।
मैं ख़याल हूँ मुक़मल्ल सा पर उसका तस्सवुर कोई और है।

सरघोषि हूँ किसी की जिसका आगोश कोई और है।
रात हूँ मैं उसका, जिसकी नींद कोई और है।

मैं ख्वाब हूँ उसका, जिसका सपना ही कुछ और है।
मैं इबादत हूँ उसकी, जिसकी दुआ कोई और है।

मैं वो अधूरी मंज़िल हूँ जिसका मुसाफिर कोई और है।
वो राह है किसी अंजाम की जिसका राहगीर कोई और है।

 

 

-प्रशांत शर्मा 

 

Prashant Sharma
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