Klaai - Rakshabandhan Special | Mid Night Diary | Aman Singh

कलाई | अमन सिंह | रक्षाबंधन स्पेशल

रोज की तरह आज भी ऑफिस के लिए निकला, फ़र्क सिर्फ इतना था कि आज मेट्रो में भी खालीपन सा था। रोज की तरह आज भीड़ नहीं थी। कुछ लोग थे हँसते, मुस्कुराते.. या यूँ कहूँ कुछ कलाइयाँ थी, चमकती हुई जो बिना कुछ कहे ही अपनी ख़ुशी बता रहीं थी।

उन चमकती कलाइयों को देखते ही मुझे अपनी कलाई याद आ गयी और तुम्हारा ख्याल आँखों से बह निकला। नहीं मेरी कलाई सूनी नहीं है, पर इसमें वो चमक भी नहीं है। आज मैं और मेरी कलाई दोनों उदास हैं।

तुम्हें याद है, दो साल पहले तुम्हारी राखियाँ मुझ तक पहुचने में कुछ ज्यादा ही वक़्त ले गयी थी। बस वही संभाल कर रखी राखियों से अपनी कलाई को सज़ा लिया है, मैंने।

इन बीते पांच सालों में भले ही हमारे बीच पांच सौ किलोमीटर की दूरियाँ क्यूँ न आ गयी हो? लेकिन वक़्त के बढ़ते इस फासले में हम बेहद करीब आ गये हैं।

पिछली रात फ़ोन पर तुम्हारा कहना, “दुखी मत होना, क्या हुआ जो इस बार तुम आ नहीं पाये? जल्द ही मिलेगें”

कहते कहते तुम्हारा गला भर आया था, लेकिन तुमने ज़ाहिर नहीं होने दिया और फ़ोन रखने से पहले गुस्से के अंदाज में तुम्हारा यह हिदायत देना कि, “पारेशान न होना, आराम से सो जाना”

तुम्हें तो पता ही है, जब मन उदास होता है, दिल बे-चैन होता है तो नींद आती कहाँ है? और गर मैं जागता हूँ तो सोती तो तुम भी नहीं हो।

पुराने दिन याद आते हैं, जब कुछ कहते थे, “खुश नसीब हो तुम कि तुम्हारी बहन है” और मेरा जवाब होता था, “तुम्हें नहीं पता कितना परेशान करती है वो मुझे”

लेकिन हाँ प्यार भी सबसे ज्यादा वो ही करती है। ब्रेकअप की रात हो, या खाना बनाते बनाते हाथ जलने वाली शाम, सिर्फ तुम ही तो थी जिसे सबसे ज्यादा ख्याल था।

अब दोस्तों का कहना कि खुश नसीब हो तुम कि तुम्हारी बहन है। बस तकलीफ़ तो इसी बात की है कि बस वक़्त नहीं है।

 

-अमन सिंह

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