Kisi Mod Par | Mid Night Diary | Prashant Sharma

किसी मोड़ पर | प्रशान्त शर्मा

मसला ये है की आशिकी में कुछ न कमाया हमने।
ये जो दर्द में अमीरी है ये तो मिली है इनाम के तौर पर।

जो तुमसे न मिली वो किसी और में ढूंढेंगे,
लुटाएंगे अब हम भी मोहोबत्त थोड़ी किसी और पर।

याद दिलाता है हर चेहरा तेरी, हर पहलु में तेरा ज़िक्र रहता है।
दिख ही जाता है कोई मजनू अपनी लैला के साथ किसी मोड़ पर।

ये तो रहमत-ऐ-आशिकी है, की हम कुछ तो हुए।
कुछ न हुए, बस रह गए शायर बन कर।

और जो है ये तुम्हारे ढोंग सारे मुझे जलाने के, अब बस भी कर।
राख को आग लगाने की कोशिश तू अब न कर।

रिवायत है ये की इश्क़ में दर्द तो लाज़मी है।
अब अगर आशिक़ है तू,तो अपनी आशिकी साबित तो कर।

और जो है सुकून तेरे वस्ल से कई ज्यादा है मेरे हिज़्र में,

तू यु खुश रहने का बहाना न कर, यु नुमाइश न कर।

तेरा गुरूर था में, खेर अब तेरी गलती सही।
मेरा अब तेरी बातों में बार बार ज़िक्र न कर।

यु आकर नज़रो के सामने मेरी, बार बार।
मुझे मेरी गलती पे तू शर्मिंदा न कर।

देख ज़रा मुड़ कर कभी, तेरे नाम पर लोगो ने तंज कसे सो है।
यु बेवफाओ में तू नाम अपना शुमार न कर।

में जज़्बात बया करता हु,लफ़्ज़ों को अलग ही पैमाने में तौल कर।
मेरे हुनर पर मेरी शायरी पर तू इतना गौर न कर।

और ये गुज़ारिश है की किस्सा अपना तू सरे आम न सुनाना।
में तो हो लिया जो होना था, तू अब खुद को तो बदनाम न कर।

और ऐसा है की सुकून बड़ा मिलता है मुझे महफ़िल में दो शेर पड़ कर।
तसल्ली सी रहती है नुमाइश ऐ जज़्बात कर कर।

 

-प्रशांत शर्मा

 

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