Khuda Ka Sauda | Aditi Chatterjee

आहटों से टूटी नींद, मैं सहम गई,
कभी इस कमरे कभी उस कमरे
कभी यहाँ कभी वहाँ गई,
हल्की फुलकी रौशनी थी,
पाँचवे पे काँटा था,
‘रहने भी दो! कोई वहम होगा’
अभी तो मोहल्ले में चारों ओर सन्नाटा था।

खुद को पागल ठहरा ही रही थी कि परदे के पीछे से वो निकला,
अजनबी को देख डर गई,
एक ही सांस में सब कुछ पूछ डाला।

“अरी! डरो मत, मैं थक गया हूँ डरते लोगों को देख”
उफ्फ्फ! ये तो रोने लगा।
‘कहाँ से आये हो, कौन हो तुम?’
पूछ्कर हाथ में पानी का ग़िलास थमाया।

थोड़ा खुद को सम्भालते, आंसू पोंछते, कहा- ‘मैं ख़ुदा हूँ।’

खिसक गई ज़मीन ही जब उसने रूप दिखाया
अब़द तक भूल न पाऊ, ऐसा मंज़र पाया ।
‘या ख़ुदा! तेरा ये हाल क्यूँ है?’
मैंने कई बार सवाल दोहराया।

एक घूँट ली फिर वो कहता गया-
“मैं अब खुद भी वाकिफ़ नहीं खुद से कि मैं ख़ुदा हूँ,
“अज़ल तक सब हो जाएगा ठीक”
खुद को देता दुआ हूँ,

निकली थी टोली इंसानो की
जन्नत की खोज में ,
तब मालूम न था सिला इसका, मैं बैठा रहा मौज में,

एक एक कर ग़ुनाह मेरे नाम पे ही कर गए
खुद बन के ख़ुदा, ख़ुदा को वो मार गए,
अब हुआ यूँ! कि जन्नत में मचता शोर है,
” निकल जा ख़ुदा तेरा घर कहीं और है “।

ज़िब्ह मेरा जाना अब,
मेरा जन्नत दरहम है,
घुमा के नज़रे देखी तो
सब मुझसे ही बरहम है।

बट गया मैं खुद अपने ही जहाँ में,
कभी रंग, कभी नाम, इनमे खुद को ढूंढ़ता यहाँ मैं।
लो सुना दी अपनी दर्द-ए-दास्ताँ मैंने,
तुम्हारे घर में कोई हो जगह तो बतओ, जो लायक हो मेरे रेहने।”

खुदा की बातों पर मैंने थोड़ा बहोत हिसाब किया,
“पहले बताओ, तुम किसके ख़ुदा हो?”
आख़िर में मैंने सवाल किया।
यूं जो सौदा मैंने ख़ुदा का ही कर दिया,
लौट गया उस दर से वो
मैं भी इंसान हूँ, उसने पहचान लिया।

 

-अदिति चटर्जी

Aditi Chatterji
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