खोने का डर | दिव्यांशु कश्यप ‘तेजस’

तुझे पाने की चाहत नहीं मुझको,
पर तुझे खोने का डर लगता है।

रिश्ता भी कुछ खास नहीं तुझसे,
पर ये डर मुझको हर पहर लगता है।।

खानाबदोश जिन्दगी थी मेरी अब से पहले
पर अब तेरा दिल ही मुझको अपना घर लगता है।

चल तो पड़ा हूॅ मंजिल की तलाश में अकेले ही
पर तू हमसफर नहीं तो सूना सा ये सफर लगता है।।

वो कहती है कि मेरी अपनी दुनिया है,तेरी याद नहीं आती
पर उसका दुपट्टा तो अब भी ऑसुओं से तर लगता है।

प्यार करती हूॅ तुझसे, कहा था उसने एक बार मजाक में
तब से मेरा दिल न इधर लगता है न उधर लगता है।।

बड़े अदब से हट गया था तेजस उसकी राह से
और कहा कि तू जा उधर तेरा मन जिधर लगता है।

रोते रोते पूछ ही लिया आखिर उसने कि मुझे भुला क्यों नहीं देता
मैने कहा कि झूठा ही सही पर तेरे मजाक का है अब भी असर लगता है।।

 

– दिव्यांशु कश्यप ‘तेजस’

 

Divyanshu Kashyap TEJAS
Divyanshu Kashyap TEJAS
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