खत तुम्हारे नाम | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

सुनो प्रिय

तुमसे एक बात कहनी थी लेकिन हमेशा से बेकाबू दिल पे काबू करते आया हूँ|

तुम्हारे घर के सामने मेरी साईकिल का चैन उतरना भले ही तुम्हे “इत्तेफाक” लगता रहा हो, लेकिन मेरे लिए वो एक बहुत बड़ी अचीवमेंट होती थी ना जाने कितने दिनों की कल्पना, रिहर्सल और प्रीप्लानिंग होती थी . तुम्हारे उस 10 सेकंड के दर्शन से दिल को बहोत सुकून मिलता था|

जब हम बारिश के समय तुम्हारे दरवाजे पर फिसल के गिरें थे और तुमने बड़ी जोर से ठहाके लगाये थे! दरअसल उस समय हम नहीं बल्कि हमार दिल फिसल के गिरा था ताकि तुम्हारे दिदार करने का कोई बहाना उसे मिल जाय और तुमपर कोई इल्जाम भी ना लगा सके|

वो तुम्हारी इतिहास की कॉपी पहली बार मांगने पे इतना नरवस हो रहा था लेकिन जब तुमने बिना कुछ सोंचे मेरी तरफ अपनी कॉपी बढ़ाई हौसले बुलंद हो गये थे रात भर तुम्हारी हैंडराइटिंग में मुग़लकालीन सभ्यता और पानीपत का द्वितीय युद्ध सौ बार दोहराई और हाँ तुम्हारी गणित की सूत्र अभी तक मेरे दिल मे कैद है कांपी के लास्ट पेज पे जो तुमने एक लाल रंग का दिल बना रखा है उसमे तुमसे बिन पूछे ही मैं अपने आप को देखता आया हूँ।

तुम्हारा घर से बाहर निकलते ही मेरा तुमसे टकरा जाना इत्तेफाक नहीं था…. वो भी इश्क ही था, दीदार ए चाँद में कितने सूरज अब भी ढल जाते हैं।

तुम्हारे तरफ देखकर नजरें फेर लेना जैसे कि तुम्हें देखा ही नही…. वो भी प्रेम ही था, तुम्हें बड़ी हसरत से देखा करती थी प्रेम अब तक उन उदास आँखों में मौजूद है।

राहों में चलते हुए अचानक से तुम अंगुलियाँ जो थाम लिया करती थी….. वो भी प्यार ही था, लड़खड़ाते वक्त आज भी हाथ अचानक बढ़ जाते हैं।

तुम्हारे आगोस में सोए जब जुल्फ कभी चेहरे पर आ जाती थी और तुम अपनी उंगलियों से अपने बालों को संवारती थी ना, मैं अबतलक उन्हीं में उलझ कर रह गया हूँ ।

आज जब मैं तुमसे थोड़ा दूर हूँ तो एक बात समझ में आई है कि ये जो इश्क होता है न ये तुमसे न मिलने से खत्म नहीं हो जाया करता, बात बन्द हो जाने से इश्क खत्म नहीं होता, कहने को हम तो खुद को समझा लेते हैं कि बस अब सब कुछ खत्म हो गया, नहीं बात करनी अब एक दूसरे से, रह लेंगे एक दूसरे के बगैर, पर तुम्हें याद किये बिना एक दिन भी नहीं गुजरता, हमारी जुदाई में भी इश्क है, अब साथ न होकर भी इश्क मुक्कमल है।

 

 

-रौशन मिश्रा सुमन

 

Raushan Suman Mishra
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