ख़त | सारांश श्रीवास्तव | लव लेटर

रात के खामोश सन्नाटो में
जब
लिखा था चाँद को तुम्हारी तरह,
पहली बारिश की सौंधी सुगंध में जो थी महक तुम्हारी,
और
किसी दरिया पर चाँद की परछाई
सच मनो जैसे हो तुम्हारी पायल
हाँ !!

ये वही खत हैं,
जो मैंने तुम्हारे लिए लिखे थे….
जिनमे लिखा था सिर्फ तुम्हे ही
तुम्हारे लिए….

वही सारे खत
अब ओढ़ कर सो रहे है
मेरी डायरी के पन्नो को
ये वही खत है
जो तुम्हे कभी दे ही नहीं पाया मैं
तुमसे मिलकर भी
न जाने क्या डर था??
नहीं जानता….

तुमसे मिला तो
पर दे ही नहीं पाया
एहसास की श्याही से
जो लफ्ज़ कोरे वर्क पर उतरे थे
वे अभी तक अधूरे है….

कि तुम्हारे हाथो की छुअन से ही मिलते है हर लफ्ज़ को मायने
और होती है हर रचना तब ही मुकम्मल जब लफ़्ज़ों पर हाथ फेरते हुए
भिगो देते हो तुम तुम्हारी आवाज़ में….

यूँ ही
इत्तेफाकन
किसी रोज़
यकीनन
तुम्हे समर्पित कर दूंगा
वे सारे खत
जो लिखे थे सिर्फ और सिर्फ तुम्हे ही तुम्हारे लिए
यकीनन
किसी रोज़….

 

-सारांश

 

Saransh Shrivastava
Saransh Shrivastava

599total visits,1visits today

2 thoughts on “ख़त | सारांश श्रीवास्तव | लव लेटर

Leave a Reply