Khair Chhod Do | Mid Night Diary | Aman Singh

ख़ैर, छोड़ दो | अमन सिंह

कितना आसान है यह कह देना कि ‘छोड़ दो’

शायद यह दुनिया सा सबसे आसान शब्द होगा लेकिन इसे अंजाम तक ले जाना दुनिया का सबसे कठिन काम है। सिर्फ़ कहने भर से कहाँ कुछ छूटता है, हाँ लेकिन टूटता ज़रूर है, एक रिश्ता, एक उम्मीद, एक भरोसा और हाँ एक इंसान भी…

और फिर ऐसे में इंसान का टूट जाना बेहद ज़रूरी भी है, अगर टूटेंगे नहीं तो सम्भलेगे कैसे? पहले टूटना, फिर टूटकर बिख़र जाना बिल्कुल वैसा ही जैसा किसी समंदर का रेत हो जाना। मैं भी समंदर हो चुका हूँ, बाहर से मुस्कुराता, हँसता और बहुत ही लहरों से घिरा हुआ लेकिन अंदर से, बिल्कुल इसके उलट…

लहरों के शोर में अंदर का कोतुहल कहीं गुम हो जाता है। कितना शोर, कितनी उलझनें, बेचैनियाँ सब बस सिर्फ़ एक छोटी सी मुस्कुराहट के पीछे छिपकर दुनियाँ को तमाशा दिखाते हैं। कभी आसमान की ओर देख कर गिरती हुई बारिश को हाथ से समेटने की कोशिश की है?

या फिर कभी रेत को हाँथों में लेकर मुट्ठी बंद करके उसको पकड़ने की, सम्भालने की कोशिश की है? नहीं सम्भलती है न, मुट्ठी बंद होने के बावजूद रेत किसी ना किसी तरीक़े से हाथों से फिसल ही जाती है और बंद मुट्ठी भी खली रह जाती है।

समंदर तो कब का हो गया हूँ, मैं… और अब उस समंदर का बस रेत हो जाना बाक़ी है। वो रेत जिसे लाख कोशिशें करके भी सम्भाला नहीं जा सकता। हाथ खुले हो या बंद मुट्ठी हो, रेत का बिखरना तो तय है। ख़ैर तुम्हें क्या? तुम इसे ऐसे ही छोड़ दो, जैसे सबकुछ छोड़ दिया।

 

-अमन सिंह

 

Aman Singh
Aman Singh

 

1637total visits,3visits today

One thought on “ख़ैर, छोड़ दो | अमन सिंह

Leave a Reply