कमीज | वैदेही शर्मा

आज फिर
कमीज़ के जेब की सिलाई उधड़ गई।
अभी परसों ही जो तुमने लगाई थी
हर माह की तरह सोच रहा हूँ
क्यों ना नई कमीज़ ख़रीद लूँ।

मेरी सोचों सी पुरानी ज़र्ज़र कमीज़
रोज़ धुलने,
इस्त्री होने,
की आदी हो गई कमीज़,
फिर सोचता हूँ-
नई ख़रीद लूँगा तो
मेरी पहचान मिट जाएगी,
मेरी हस्ती बिगड़ जाएगी,
फिर लोग तुम्हें भूल जाएँगे,
“नीली कमीज़ वाले बाबू”
कह कर नहीँ बुलाएँगे।

भला कौनसी पुरानी है,
ससुराल वालों की निशानी है,
बिटिया के जनम पर ही तो लाए थे!
कमबख्त उस दिन
सिटी बस की कील में न फसती
तो इस क़दर क्यों फ़टती
ख़ैर आधा रफ़ू तो पैंट में समा जाता है,
आधा ही तो नज़र आता है।

अब इस माह नहीँ खरीदूँगा,
अगले माह देखूँगा,

और फिर ख़रीद लेने से,
सोचों का सिलसिला बन्द हो जाएगा,
अजीब सूनापन सा छा जाएगा।

 

-वैदेही शर्मा

 

Vaidehi Sharma
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