काली उदासी | पियूष भालसे

 

“तुम आजकल इतने उदास क्यों रहते हो?”
“तुम्हें पता है मेरे साथ काली उदासी रहती है।
उसके साथ रहते-रहते मैं भी अब कुछ उदास सा रहने लगा हूँ।”
” पर तुम क्यों उदास हो?कोई तो कारण होगा?”

 

” मैं क्यों उदास हूँ……”

बस इतना कहकर वो कहीं खो गया था। शायद उस सामने वाले पहाड़ के ठीक पीछे वाले जंगल में। जहाँ वो रात होने के बाद अक्सर अपनी कल्पनाओ में जंगल के बीच बसे झरने को नीचे से खड़े होकर देखता रहता था।

“कहाँ खो गए? बताओ तुम क्यों उदास हो?”
” मैं नहीं जानता”
“तुम पागल हो गए हो”

” हाँ शायद….

 

तुम्हें वो पहाड़ दिखाई दे रहा है?” मैंने कहा
” हाँ तो”

“उस पहाड़ के ठीक पीछे एक जंगल है और जंगल के ठीक बीच में एक प्यारा सा झरना बहता है। वो जंगल दिन में हरा भरा रहता है और ढेर सारा सुकून देता है। अचानक शाम के पीछे-पीछे से दुबग के रात आती है।
रात अपने संग ढेर सारा काला अंधेरा और काली उदासी लाती है। दिन में सुकून देने वाला ये जंगल रात में ना चाहते हुए भी खुद उदास हो जाता है। ”

Piyush M Bhalse

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