कलम और तुम | मिहिर पाण्डेय

क़लम में स्याही भर ली है।

आज न जाने क्यूँ लिखने को दिल चाहा है।

तुम्हारे लिए लिखूँ या तुमसे जुड़ी यादें लिखूँ।

ऊँगलियाँ को थोड़ा संकोच है।

तुम्हारे बारे में सच लिख नहीं सकता।

और यादें, उन्हें तो मैं कब का मिटा चुका हूँ।

तो लिखूँ क्या?

ये सवाल अपने आप से है।

लिखावट तो इतिहास बन जाती है।

और हमारे देश में इश्क़ के इतिहास को दफ़ना दिया जाता है।

तो किसके लिए लिखूँ?

इश्क़ करना बहुत ही आसान है।

लेकिन उसे निभाना, उसे सहेज कर रखना मुश्किल है।

जिसने निभाया वो तो उस पार है, हम किनारे पर बैठ आज भी उस पार जाने की कोशिश कर रहे है।

 

-मिहिर पांडेय

 

Mihir Pandey
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