कल, सिगरेट और तुम | धर्मेंद्र सिंह

कल मेरी सिगरेट शायद आखिरी
बार जलेगी

फ़िक्र को धुँए में उड़ाने की
नाकाम कोशिश

मैं कल फिर से करूँगा शायद
तुमसे कुछ वादे करके

मैं कल फिर भूल जाऊँगा शायद
मैं वो झूठी कसमें कल फिर खाऊंगा

तुम मेरे झूठ को फिर नहीं
पढ़ोगी शायद

देर से मैं जब मिला करूँगा
तुम परेशान हो जाया करोगी शायद

फिर किसी रोज़ मैं नहीं आऊंगा
मिलने

तुम फ़ोन करोगी कई बार
पर मैं जवाब नहीं दूंगा शायद

फिर चल तुम पड़ोगी अपने घर की
तरफ

कल मिलने की आस में
पर कल की सुबह कॉफ़ी के साथ

अख़बार में कहीं मेरा नाम
पढ़ोगी शायद

तब रो भी न पाओगी तुम
आओगी भागी मेरे घर की तरफ

पर तुम्हें शायद मेरी लाश भी
न मिलेगी

कल मेरी सिगरेट आखिरी बार
जलेगी

 

 

-धर्मेंद्र सिंह

 

Dharmendra Singh
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