कहानी | वैदेही शर्मा

क्या याद है तुम्हें पिछले माह जब तुमने कहा था कि तुम मेरी किसी कहानी को अपने काम में ढालना चाहते हो तो यूँ लगा कि फिर किसी ने मुझे शून्य में धकेल दिया हो। जहाँ हमारे जज़्बात साँस ना ले पा रहे हो, यूँ तो मैं लिख देती कोई भी कहानी और कह देती कि लो अब ढाल लो इसे अपने काम में…

लेकिन में उस रोज़ भी नही कह पाई कि तुम्हारे काम में ढलना ही अब मेरी कहानी बन गया है, कभी-कभी सोचती हूँ कि तुम जब मिलोगे तब इक बड़ा मसला खड़ा कर तुमसे अपना हक मांग लूँगी। फिर कभी तुम्हें जाने नहीं दूंगी, लेकिन फिर एक सवाल मेरा यह हक़ भी छीन लेता है।

क्या तुम हक़ीक़त में मुझसे मिलोगे? और फिर अटक जाती हूँ, इक यकीन परकि नहीँ तुम बस मेरे हो… क्या कभी यूँ नही हुआ करता कि तुम्हारे कैमरे के लेंस के आगे मेरी आँखें कब्ज़ा करें और जिद पर अड़ जाएकि अब और नहीं।

क्या तुम्हें कभी अपने कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर मेरे हाथो का स्पर्श महसूस नहीं होता? या फिर उस जगह जहाँ तुम्हारी फिल्में बना करती है…यूँ नही लगता कि हम यहाँ लम्बे वक्त तक उन पहाड़ो पर बैठ कर महज़ बातें करे…

हा हा हा…देखा मुझे लिखते हुए भी हँसी आगई, ये तमाम बातें लगती है न किसी ख्वाब सी? पर मैं जानती हूँ ये ख्वाब वापस आएँगे मेरे ज़हन का पीछा करते हुए…वो क्या है ना ये दुनिया हक़ीक़त की दुनिया से बेहतर है बहुत बेहतर….

और एक दिन हम ठीक इसी तरह इस कहानी को जियेंगे…!!!!

 

-वैदेही

 

Vaidehi Sharma
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