कातिल | वैदेही शर्मा

तुम्हारी आँखों की चमक से मेरा राबता उतना ही गहरा है, जितना हमारे दरमियान बैठे हुए इस सन्नाटे का है। हमारे दफ़न हो चुके जज़्बातों के साथ ठीक वैसे ही जैसे इसे किसी सख़्त चीख़ की उम्मीद हो।

क्या तुम जानते हो? तुम्हारी आँखें मुझसे तमाम बातें करा करती हैं और कल शाम जो मेरे सामने आया उसने मुझे हिलाकर रख दिया मुझे, यकीन मानो मैंने खुद को इतना बेगैरत और बेअसर कभी महसूस नहीं करा। हम वक्त को घेरकर बैठे रहे ,तब तक जब तक, वह शाम एक स्याह रात में तबदील ना हो गई।

कैसे बताऊँ तुम्हें कि “तुम और मैं कातिल हैं “ अगर कोई फर्क है तो महज़ इतना की बेमंज़र सितारों के तले जब-जब उस अक्ष को काले रंग में समेटे हुए कोई गुनाह हो जाया करता है तो उसकी कोई सजा नहीं सुनाई जाती।

अगर है हौसला तो चलो हम कुबूल करते हैं कि वह इश्क मर चुका है क्या तुम चलोगे मेरे साथ उसके चंद बचे हिस्से को दफ़न करने? यकीन मानो कभी किसी शख्स को खबर नहीं होगी कि हम कातिल हैं।

लेकिन अगर तुम्हारी काबिलियत तुम्हें ऐसा करने से थाम रही है, तुम्हारे ज़ख़्मी ख्यालों को सहारा बनाते हुए तो फिर, यह बात बस तुम्हारी आँखों और मेरे दरमियान रहेगी।

हम कह देंगे की हमने उस इश्क का क़त्ल नहीं करा बस वो बे-मौत ही मारा गया…!

 

-वैदेही

 

Vaidehi Sharma
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2 thoughts on “कातिल | वैदेही शर्मा

  1. ‘पर्दा’, ‘मौजूदगी’ और ‘कमीज’ के बाद अब ‘कातिल’, एक के बाद एक आपकी नायाब रचनाएँ, mid night diary के जरिये हम सभी पाठकों तक पहुँच रही हैं। इसके लिए हमारी और mnd की तरफ से ढेर सारी प्रशंसा और सम्मान आपको समर्पित
    आगे भी अपनी लेखनी को विराम न देते हुए आप लिखती रहें और अपनी रचनाओं को यूँही पाठकों के मनोरंजन का जरिया बनाती रहें। ☺

    1. इतनी खूबसूरत प्रशंसा के लिए आपका ढेर सारा शुक्रिया

      #धर्मेंद्र जी

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