काश! मम्मी पापा मॉडर्न होते | अनुपमा वर्मा

काश मम्मी पापा माडर्न होते, ज्यादा नही बस इतने ही कि वो हर दिन झगडा करने के वक्त मेरे कान मे रूई डाल कर उन्हे बंद करने का रिवाज अपना लेते।

पर ऐसा नही है मम्मी पापा माडर्न नही है वो मेरे सामने ही लडते है और मै चाह कर भी अपने कानो मे रूई डालकर उन्हे बंद करके खुद को वो सब सुनने से नही बचा पाती जो मै नही सुनना चाहती।

काश! मम्मी पापा समझ पाते कि रोज रोज की किच किच, गाली- गलौच करना और उन्हे एक दूसरे पर घटिया इल्जाम लगाते देख मुझपर क्या असर हो रहा है।

पर ऐसा नही है मम्मी पापा नही समझ रहे है वो तो बस मेरी फीस भर देते है और मै पढकर अच्छे अंक प्राप्त करू ये उम्मीद करते है जो मै लाख कोशिशो के बावजूद भी नही कर पाती हूँ।

काश! मम्मी पापा अपने रिश्ते को रेस ना समझते और इस बोझ जैसे रिश्ते मे रेस की तरह दौडते हुए सबको चोट पहुँचाकर सिर्फ खुद जीतने की कोशिश ना करने की बजाय एक दूसरे को समझने की कोशिश करते तो हालात इतने नही बिगडते।

पर ऐसा नही है मम्मी पापा ने अपने रिश्ते को रेस बना दिया है वो एक दूसरे को समझने की बजाय इस रेस जैसे रिश्ते मे एक दूसरे को हराना चाहते है इसी लिए खुद जख्मी होकर और मुझे जख्मी होता देखकर भी जीतने के लिए दौडे जा रहे है उस जीत के लिए जो मेरी सबसे बडी हार होगी।

काश! मम्मी पापा जैसे एक घर मे साथ रहते है वास्तव मे भी एक दूसरे के साथ होते..

तो शायद उनका रिश्ता रेस नही बनता, वो मेरी खामोशी की वजह ना बनते, ना मै कभी ये लिखती कि काश! मम्मी पापा माॅडर्न होते।

 

-अनुपमा वर्मा

 

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