Kaash! Ki Woh Duniyaa Main Aayi Hi Naa Hoti | Mid Night Diary | Bhavna Tripathi | #UnlockTheEmotion

काश!कि वो दुनिया में आई ही ना होती | भावना त्रिपाठी | #अनलॉकदइमोशन

उसके वजूद,उसकी ख़ुद्दारी,उसकी आबरू की लड़ाई ही न होती,
काश!कि वो दुनिया में आई ही ना होती।

वो दस साल की हो चुकी है,
ना जाने क्यों,माँ उसे अब फ़्रॉक नहीं पहनने देतीं।
ना सिर्फ दुपट्टा सीने से सटाकर रखने की नसीहत मिलती है,
बल्कि अब तो बगल वाले भैया के साथ, छुपन छुपाई भी नहीं खेलने देतीं।
अरे, मम्मी तो ख़्वामख़्वाह ही डरती हैं,
मैं तो लड़की हूं और लड़कियाँ तो नाज़ों से पलती हैं। काश! कि उसकी गलतफ़हमी किसी ने मिटायी न होती,
काश!कि वो दुनिया में आई ही ना होती।

आज घबराई हुई थी वो,
भूल नहीं पा रही थी वो बातें।
वो टैंपो में बगल वाले अंकल का बार-बार धीरे से हाथ छुआना,
वो ड्राइवर की सामने वाले शीशे से घूरती हुई आँखें।
न जाने क्यों नुक्कड़ पर खड़े लड़के,उसे देख सीटी बजा रहे थे,
‘तू चीज बड़ी है मस्त’ और ‘चलती है क्या नौ से बारह’ वाले गाने गा रहे थे।
एक लड़की से ‘चीज’, बनाई ना गई होती,
काश! कि वो दुनिया में आई ही ना होती।

माँ, ये रेप क्या होता है,उसने अचानक आकर पूछा था,
अखबार में तो पढ़ती ही थी, आज तो उसने टी.वी. में भी देखा था।
बेबस माँ क्या बताती उसको,बस बहते आँसू को चुपचाप पल्लू से पोंछा था,
जिसके बारे में वो मासूम पूँछ रही है न, दरअसल तीन साल की उम्र में,उसके साथ वो पहले ही हो चुका था। खिलौनों से खेलने की उम्र में,वो खिलौना बनाई न गई होती,
काश!कि वो दुनिया में आई ही न होती।

आँचल में छुपा लो माँ,यहाँ सब बहुत सताते हैं,
सहम जाती हूँ,काँप जाती हूँ,कई बार तब भी,
जब पापा, भैया या टीचर भी मुझे हाथ लगाते हैं।
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते,रमंते तत्र देवता,आज स्कूल में पढ़ा था,
पर कैसे मान लूँ ये,बाहर ही एक दीदी का खिंचा हुआ दुपट्टा पड़ा था।
भारत की संस्कृति पर उसने उंगली उठाई ही न होती, काश!कि वो दुनिया में आई ही न होती।

वो दर्द में थी,सुबक रही थी, होंठ काँप रहे थे,
क्या वाकई दरिंदों को मिलेगी वाजिब सज़ा,यही आखिरी लफ़्ज़ थे, जो उसने कहे थे।
अब कहाँ बेचारी स्वाभिमान की स्वामिनी थी,
स्कूल में दिव्या थी,वो सड़क पर दामिनी थी।
जिसके हृदय विदारक क्रंदन थे और खून से लथपथ थी, वह पाँच साल की गुड़िया थी,
जिसकी चीख तक ना निकल पाई थी, बस कोने से एक आंसू टपका था, वह पड़ोस वाली सौ साल की बुढ़िया थी।
रेप में उनकी मर्ज़ी शामिल है,ऐसी दलीलें दिलवाई ही ना गई होतीं,
काश!कि वो दुनिया में आई ही ना होती।

कैसे बयाँ करूं उस घिनौने एहसास को, जो इस वक़्त महसूस हो रहा है,
हम उस देश में रह रहे हैं,जहाँ बेटी कहती है, पापा आज रात छोड़ दो,बहुत दर्द हो रहा है।
लिख कर ले लो,जवाब नहीं होगा,मूक हो जाओगे तब,
जब चौदह साल की लड़की बोलेगी,मैं बच्ची कहाँ रही अब।
उनके बचपने पर किसी ने नज़र लगाई ही न होती, काश!कि वो दुनिया में आई ही न होती।

 

 

-भावना त्रिपाठी

 

Bhavna Tripathi
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