Kaanch | Friendship Day Special | Aman Singh | अमन सिंह

कांच | अमन सिंह | फ्रेंडशिप डे स्पेशल

लोगों का यह कहना कि मैं पत्थर हो गया हूँ, अब नहीं खलता और न ही अब कोई फर्क पड़ता है, इस बात से कि कोई क्या कहेगा? क्या सोचेगा?

कभी सूरज को ढलते हुए देखा है? कैसे किस तरह से गुरुर में पूरे दिन चमकने वाला सूरज शाम होते होते बेबस और लाचार होकर, बादलों के पीछे कहीं छिप जाता है। बस अब वही सूरज हो गया हूँ मैं…

तमाम कोशिशों के साथ अब खुद को पूरे दिन संभालना मुश्किल होता जा रहा है। कितने ही जतन कर लूँ , कितने ही तरीके ढूंढ लूँ, लेकिन बूढ़े होते दिन के साथ साथ रोज़ मेरी हिम्मत बिखरने लगी है।

याद है वो रात, जब सिर्फ ख़ामोशी बात कर रही थी। किस तरह से चीखती आंखों के पीछे का दर्द तुमने ढूंढ लिया था। कुछ भी कहने को लफ्ज़ थे ही कहाँ? अगर कुछ था भी, तो वो थी उस रात की ख़ामोशी…

रात की वो ख़ामोशी, चीखती आँखें, बेचैन हवा और तुम.. मेरा कुछ न कहना मुझसे ज्यादा तुम्हें तकलीफ़ दे रहा था। कितना कुछ था जो बस यूँ ही बह गया, मेरी आँखों से…  तुम्हारा मुझे सीने से लगाना और मेरे लफ़्ज़ों का आँखों से बिखर जाना। जैसे तुम्हारे गले से लगा, मैं कांच की तरह बिखर गया।

फिर से रातें जागने लगी हैं, हवायें न जाने कब से बेचैन हैं, हाँ ये आँखें अब चीखती नहीं लेकिन इस ख़ामोशी का क्या करूं? तुम लौट क्यूँ नहीं आते? हर रात टूटता हूँ मैं, बस काँच की तरह बिखर नहीं पाता।

लौट आओ मेरे दोस्त, बस तुम्हें गले से लगा कर काँच की तरह एक बार फिर बिखर जाना चाहता हूँ, मैं।

 

-अमन सिंह

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