Jana | Mid Night Diay | Amrit

जाना | अमृत

“जाना”, ये शब्द कभी भी सुखदायी नही हुआ न,
बचपन की लट्टू की सुतली से जब,
उंगलियां निकाल,
उनमे चॉक फँसा कर स्कूल “जाना” हुआ,

लगा जैसे किसी वृद्ध को वृद्धाश्रम भेज दिया हो,
उनके ही बच्चों ने,
पढ़ाई समझ आने लगी थी,
समीकरण की मिट्टी पे हल चलाने ही लगे थे कि,
नौकरी नाम की हौवा के शिकार पर “जाना” पड़ा,

ज्ञान को कहीं किसी कोने में पटका,
और शिकार की प्लानिंग में लग गए,
किताबों को उल्टा पलटा,
बिना बूझे ही जानते गए सब,
और कूद पड़े,

गोया सीमा पे खड़ा सैनिक,
बिना किसी पहचान के ही,
चलाता है गोलियां, अपने दुश्मनों पर,
वो दुश्मन जिससे उसकी कोई दुश्मनी नही
नौकरी की हौवा जो पकड़ में आई तो,
गाँव छोड़ शहर ” जाना ” पड़ा,

अब नौकरी ठहरी हाई फाई,
गाँव मे वो रह नही पाती न,
सो उसे शहरों में ही बसाया गया है,
इस बार छोड़ना था मुझे,

अपना आँगन, गलियों में बिखरा बचपन,
नुक्कड़ की सर्दी, बांध पे की मस्ती,
और मुझे “जाना” था, धुएँ के धुंध से पहचान लिखने,

हवा पे हवा से अपना नाम लिखने,
बहरहाल, नौकरी की रंगों में खुद को रंगा,
मन को जोत दिया, जबरदस्ती ही
मन किसी वफादार बैल सा,
यहाँ भी मिट्टी को उपजाऊ बनाता रहा,
कि तभी वो मिली “जाना”,

मैं बुद्धू उसे बुलाता ही “जाना” था,
इस शब्द की महिमा से अनजान जो था,
तो “जाना” एक झटके में,

नौकरी की सिसक, बचपन की ललक,
गाँव की कसक, साँसो में अटका हलक,
सब पे छा गयी,
और फिर, एक रोज
“जाना” का जाना हुआ,

अब जो आया है उसे तो जाना ही है,
पर इस बार,
, नींद गयी, सुकून गया,
लकीरों में बुना भविष्य उघर गया,
ढूँढता फिरता हूँ खुद को,
अब गली गली, मुहल्ले मुहल्ले,
जब से,
“जाना” तेरे साथ , मेरा भी” जाना” हुआ..!!

 

 

—अमृत

बेजान रिश्ता अमृत राज
Amrit

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