Jajbaaton Ke Syaah | Mid Night Diary | Surbhi AnandJajbaaton Ke Syaah | Mid Night Diary | Surbhi AnandJajbaaton Ke Syaah | Mid Night Diary | Surbhi Anand

जज्बातों के स्याह | सुरभि आनंद

दरकती हुई दिल की गलियो में
तुम मोड़ लेने आए थे
मेरे अंदर तुम्हारा उत्साह ही नहीं
जो मेरी ओस को जगा रहे हो,
क्यूँ बहाना कर रहे हो, दुआओं-का
मुझे खुशी नस्तर-सी चुभती है।

हाँ ! हूँ, मैं अकेले
एैसे ही सादी जिंदगी है मेरी
रोज दर्द पहनती हूँ
झूठी मुस्कान ढोती हूँ,
मुझमें नहीं रहती उमंग
हाँ, खौफ-सा साया जरूर रहता है,
हमेशा पीछे खड़े हो, यह मेरे
मुझे काली-धौंस देता है।

क्यूँ कहूँ मैं जज्बात किसी से
जबकि, मैं खुद से ही
कुछ नहीं कह पाती
मेरी आत्मा काँटों की बाड़ में है,
तबहीं तो मैं कली,
फूल नहीं खिल पाती।

तुम्हें नाराज होना है ना,
शौक से रौब जमा लो
मत पहनाे मेरे दु:ख का परिधान
मेरे साये से ही मुखातिब हो लो।

हाँ! थोड़ा-सा परवाज किया है मैंने
खुद को शुली की नोंक पर रखकर
क्या करूँ लड़की हूँ न,
चार दीवारों से ही टकराकर
जख्म कविता सँभल जाती हूँ।

नादान तो मैं हूँ, तभी तो…
आहटों को किनारा देती हूँ,
कागज है दिल मेरा,तभी तो… .
मोम जज्बातों को लिखती हूँ,
लाल गुलाब रोज मस्तक पर
तुम क्यों छोड़ जाते हो,
मैं मंदिर नहीं दुआओं-का
जो तुम, मुझे ही पढ़ आते हो।

मेरी चौखट पर सिर्फ दु:ख के पन्ने
बिखरे पड़े है,
हर पन्ने पर जज्बात रोया है मैंने
तुम्हें मुझे जानना है ना,
तो, गुलाब से नहीं
मेरे भींगे अहसासो से पूछो
मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ… .
क्यों मैं खुद को जीती नहीं
आखिर क्यों मैं हूँ,
सादगी लिबास में।

 

-सुरभी आनंद

 

Surbhi Anand
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One thought on “जज्बातों के स्याह | सुरभि आनंद

  1. शब्दों की विविधता और कटाक्ष रस ने काव्य रचना को विस्मयादिवोधक एहसासों की गहराई में जा छोड़ा है। खूबसूरत कविता। ❤️

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