जब भी तुम याद आती हो | दिनेश गुप्ता

उम्र के हर पड़ाव में, जीवन के हर बदलाव में
रात में कभी दिन में, धूप में कभी छाँव में

जज़्बातों के दबाव में, भावनाओं के बहाव में
ज़ख्मों पर मरहमों में, मरहमों पर फिर घावों में

जब भी तुम याद आती हो, आँखों से नींदे चुरा जाती हो

बरसते हुए बादल में, ठहरे हुए जल में
भीड़ में-तन्हाई में, ख़ामोशी में-हलचल में

खिलती हुयी कलियों में, महकते हुए फूलों में
आज में-कल में, गुजरने वाले हर पल में

जब भी तुम याद आती हो, धड़कनों से साँसें चुरा जाती हो

महफ़िलों में-वीरानों में, अपनों में-बेगानों में
हकीकत में-ख़्वाबों में, सपनों में-अरमानों में

रुसवाइयों में-तन्हाइयों में, अपमानों में-सम्मानों में
मंदिरों में-मदिरालयों में, मयखानों में-पैमानों में

जब भी तुम याद आती हो, हाथों से जाम झलका जाती हो !

 

-दिनेश गुप्ता 

 

Dinesh Gupta
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