Intejar-e-Mulaqaat | Mid Night Diary | Manjari Soni

इन्तजार-ए-मुलाक़ात | मंजरी सोनी

दबे पाव ख़ामोशी से ऊँची-नीची सीड़ियों से होते हुए ,तुम शहर के बाहर वाले टूटे-फूटे महल की छत पर आना ,मैं बना के लाऊँगी मैथि के पराँठे खटे मीठे निम्बू के अचार के साथ फिर साथ बैठ के खाएँगे हम दोनो यार।

इस बार बातें नहीं,पुरानी यादें होंगी ।स्कूल में होने वाली शरारतो की प्लानिंग नहीं ,बस उनकी यादें होंगी।होंठों पर मुस्कान लेकिन आँख हमारी नम होगी ।

कैसे एक दूसरे के बिना हम स्कूल नहीं जाते थे। कैसे पढ़ते वक़्त हीं हमें दुनिया भर के सारे काम याद आते थे। कैसे परीक्षा के सिर्फ़ १० मिनिट पहले मेरे सारी परेशानिया दूर करने के लिय तुम अौर मैं मैदान में युहीं बैठ जाते थे ।

फिर ११ वी कक्षा में जब विषय चुनना था, हम दूर ना हो जाए इसलिये तुम अकेले हीं जाकर हम दोनो का फ़ार्म भर आए थे। फिर दो साल मस्ती, लड़ाई करते करते कहा निकल गए हम दोनो को हीं नहीं पता चला।

वादा तो हम दोनो ने किया था ,फरवेल पर मिलते रहने का लेकिन, ज़िंदगी की दौड़ में कब हम दूर हो गए पता ही नहीं चला ।

चार साल में ना जाने कितनी ही बार हमने मिलने का सोचा ,लेकिन मिल ना पाए आज अच्छा मौका है हम दोनो इस शहर में हैं । अच्छा सुनो सबसे ज़रूरी बात मोबाइल अौर लैप्टॉप घर छोड़ आना तुम ।

आज आँन लाइन की दुनिया से दूर हम फिर चाँद को देख सपने सजाएँगे ।3-4 घंटो में साथ बिताए 12-13 साल की सारी यादें जी लेंगे। तुम आना दबे पाँव ख़ामोशी से।

 

-मंजरी सोनी

 

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