इन्साफ | अरविन्द्र राहुल

ये नाम आंखें ,मुरछाया चेहरा।

झुकी कमर और दुःख का पहरा।
देख रहे हो … ये हरिया हे।

कचहरी के रोज दो चार चक्कर लगता हे।

पहले अपने बाप के साथ आता था।
आज अपने बेटे को साथ लाता हे।

हाँथों में कोर्ट के पुराने फैसले ,और नकलों क़ो सँभाले है।
पैरों की कौन बात करता हे,इसके दिल तक में छाले हैं।

बाबुओं औऱ वकीलों से रोज नयी तरकीब मिल जाती है।
फ़ैसला तो होता नहीं बस तारीक बढ़ जाती है।

फिर भी इसे आस हे विश्वास हे,की वो दिन जरूर आयेगा।
जब कोर्ट का फ़ैसला इसके हक में हो जाएगा।

और जिस जमीन को निहारते निहारते।

इसका बूढ़ा बाप मर गया।

उस ज़मीन पर इसका बेटा हल चलाएगा।

उस जमीन पर इसका बेटा हल चलाएगा।

 

 

-अरविन्द्र राहुल

 

Arvindra Rahul
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