इंदु | विनय साहू

ऑटो के चलने के आवाज और आस पास के ट्रैफिक के शोर-शराबे के बीच वो ऑटो में चढ़ी, करीब 3 बरस बाद मैंने उसे देखा था। वही चेहरा था पर अब वो चमक नहीं थी, वो मुस्कराहट गायब थी, वो रंग नहीं थी, वो बात नहीं थी।

कोई चेहरा कितना अजीब दिखता है न जब वो बेरंग हो जाये, ये वही चेहरा था, जो घर को महज मकान नहीं, घर बना कर रखती थी।

वो, जिसके बिना घर अधूरा और सुना-सुना लगता था, अब ये चेहरा भी कितना सुना और उदास सा लगता है जैसे उसने ने दुःख के पानी से धोया हो, उस चेहरे को तकना जिस पर कभी शिकन की लकीर तक नहीं आयी थी उस पर चिंता के सिवाय कुछ भी नहीं।

कोई कैसे कह सकता है कि ये वही चेहरा है। ज़िन्दगी बड़ी बेरहम होती है कई बार हमसे बिना पूछे हमारी सबसे प्यारी चीज़ छीन लेती है और दे जाती है गमो का पहाड़।

ख्याल आता है कि तीन साल पहले जो लड़की घर में चहकती रहती हमेशा, स्वछंद और निर्भीक।स्वतंत्रता उसकी परिभाषा सी लगती थी और ख़ुशी उसकी साथी।

पर अब चहकती चिड़िया हाथ पीले करा घर छोड़ जाने लायक हो चुकी थी।शादी के लिए अच्छा वर भी मिला, पुलिस वाला था, रौबदार, हट्टा-कट्टा, नौजवान, घनी मूंछे रखता था।नक्सल इलाके में पोस्टिंग थी, 5-6 साल हो गए थे वहा रहते हुये, शादी के बाद दोनों वही रहने लगे। बड़ी सुन्दर जोड़ी थी।

खिलखिलाकर हँसने वाली, अपनी बात बड़ी बेबाकी से रखने वाली पत्नी, तो मंद मंद मुस्कराने वाले, बहुत कम बोलने वाले पति।एक वर्ष बाद भगवान् ने उन्हें लक्ष्मी स्वरुप पुत्री दी, सब कुछ हंसी ख़ुशी चल रही थी।

पर जीवन के तराजू में गम का भी उतना हिस्सा रखना पड़ता है जितनी ख़ुशी का।
पति का आकस्मिक निधन हो गया, पुत्री केवल 3 महीने की ही थी, इस सदा मुस्कुराने वाले चेहरे पर तो जैसे दर्द का पहाड़ टूट पड़ा था। अभी तो वैवाहिक जीवन अच्छे से शुरू भी नहीं हुआ था और जीवन ने ऐसा दर्दनाक मोड़ ले लिया था।

जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला, 3 महीने बाद पति की पोस्ट पर खुद नौकरी करने लगी, ट्रांसफर लेकर अपने शहर में आ गयी थी।

आश्चर्य होता है कि ज़िन्दगी क्षण भर में कैसे पासा पलट देती है।अब उस चेहरे में तेज़ नहीं दिखता, जबाँ अब ज्यादा नहीं बोलते, आँखे शायद हरदम किसी को ढूंढती है ये जानते हुए भी की अब वो शायद वापिस नहीं आएगा, अब बाल पहले जैसे नहीं बने रहते, साज-श्रृंगार के बिना चेहरा कितना सुना सा लगता है ना, जैसे दिवाली तो है पर दीये नहीं जल रहे हो।

जाने क्या-क्या सोचती होगी वो, ऐसा क्या गुनाह किया है मैंने जो इतनी बड़ी सजा दे रहा है, क्यों ऐसे यातना झेल रही हूँ, जिसकी हक़दार मै हूं ही नहीं।

जज़्बा ही इंसान को ज़िंदा रखता है और ऐसा ही जज़्बा है उस औरत के अंदर, इंदु नाम था उसका, इंदु यानी चंद्रमा, चंद्रमा जैसी खूबसूरत थी पर अब उसकी खूबसूरत ज़िन्दगी में दाग जैसा श्राप भी लग गया था।

ये थी उसकी कहानी।

 

-विनय साहू

 

Vinay Sahu
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