Hazaar Khwaab | Mid Night Diary | Archana Mishra

हज़ार ख्वाब | अर्चना मिश्रा

रुक-रुक कर बारिश का आना,

मुझे तुम्हारा ख़्वाब दे जाता है।

ये चलते-चलते आसमां में,

अचानक चाँद का बादलों में छुप जाना भी,

तुम्हारा ख़्वाब दिखाता है मुझे।

 

तुम्हारा ही ख़्वाब आता है मन में,

जब छूकर मुझे गुज़रती हैं ये पागल हवाएँ।

किसी शाम में तन्हा सा खड़े होकर डूबते सूरज को निहारना भी,

तुम्हारे ख़्वाबों से भरा होता है मेरे लिए।

 

बंद कर अपनी थकी आँखों को,

लंबी सी लगने वाली रातें

सो जाया करती हैं जब;

तब अक्सर तुम्हारे सारे ख़्वाब,

कहीं मेरे ही अंदर से निकलकर

मुझे जगाए रखते हैं।

 

और तब मुझे ये एहसास होता है

कि तुम तो मुझमें ही हो।

एक नहीं,

तुम हज़ार ख़्वाब बनकर कहीं मुझमें ही हो।

 

-अर्चना मिश्रा

 

Archana Mishra
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