Hame Nirbhaya Mat Banao | Mid Night Diary | Priya Mehra | #16Dec

हमें निर्भया मत बनाओ | प्रिय महरा | #१६दिसंबर

साल बीत गए लोग भुल गए,
पर भुली नहीं मै वो रात,
जब खेला था गंदा खेल ,
कुछ दरिंदो ने मेरे साथ

मैं चीख रही थी चिल्ला रही थी
अपने हाथों को जोड़ उनके आगे गिडगिरा रही थी

कि बख्श दो मुझे मत करो मुझे तबाह
जिंदगी मेरी सौप दो मुझे
कोई देख रहा था मुझे

माँग रहा था उनसे जिंदगी वो मेरी
वो हस रहे थे हमारे दर्द को देख कर
खुश हो रहे थे मेरी आबरु को झकझोर कर

दर्द से मै चिल्ला रही थी
तन पर कपड़े बचाने की
इक नाकाम सी इक कोशिश कर रही थी

आखिर हार गयी उन दरिंदो से
छीन लिया उन्होने मेरी अज़मत को
पर यहाँ उनकी ये हैवानियत खत्म न हुई

अधमरा कर छोड़ दिया खाली उस सडक पर
लहु लुहान कर मुझे फेक दिया था

मौत के इंतज़ार मे
पर थोड़ी सॉसे मैने भी बचायी थी कुछ बदलाव के लिए
लोग थे बहुत गुस्से में और मै खुश थी ये देखकर
मुझे लगा था मेरी आबरू का लूट जाना

इक सावाल बनेगी
लड़कियों की सुरक्षा देश भर में मिशाल बनेगी
लाख मन्नते माँगी जा रही थी मेरी इस जिदंगी के लिए

पर इन आँखों के बदं होने से इक बदलाव सा नज़र आरहा था
शायद लड़कियों को इज्ज़त मिलेगी अबसे ये ख्याल मन में आ रहा था

पर हार गयी मैं उन लोगों को देख
जो मेरी अज़मत के छीन जाने पर अफसोस जता रहे थे
आज वही लडकियो को छेड़ मौज उठा रहे थे

भूल गए सब मेरी वो दर्दनाक मौत
खेल कैसा था मेरी अज़मत के साथ
आँखें तो मैने बंद की थी ये सोचकर

कि अब सुरझित सी होगी लडकिया
हर खामोश सी सडको पर
शायद गलत थी मै क्योंकि उस रात के बाद हैवानियत और बढ गयी
बच्ची बूढ़े सब पर अब इन दरिंदो की नजर पड़ गयी

कही इंसानियत शर्मशार हुई , कही रिश्ते बदनाम हुए तो कही बदसलूकी की हर हद पार हुई
हैवानो कि हैवानियत तो एक बार हुई
पर जब रूबरू इस समाज से हुई
तो उनके हर सवाल से मै तबाह हुई

हिम्मत नहीं थी सासे लेनी की
ऊपर से ये समाज के सवाल
कभी मेडिकल जाँच मे तो
कभी एफ आई आर में
पूछते थे वो कि कैसे हो गया ये

डर लग रहा था या क्या महसूस हुआ था तुम्हें उस रात
जब खेल रहे थे वो दरिन्दे तुम्हारे अजमत के साथ

उन्हें कोई बता दो की न पूछे ऐसे सवाल हमसे
भूलने की कोशिश होती है नाकाम इससे

आज हर साल हर महीने हर दिन हर पल
कई जिदंगी तबाह हो रही है
और हम अफसोस जता बस निर्भया उनका नाम दे रहे हैं….

 

 

-प्रिया मेहरा

Priya Mehra
Priya Mehra

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