Gud Ki Dali – Based on Farmer Suicide Case

हाथ में पत्थर उठा कर जोर से चिल्लाते हुए, भग सुबह सुबह भो भो करती रहती है, ये भूरी और कुछ काम तो हैं नहीं, हम ही खिलाये इसे और हमारी ही नींद ख़राब करे, खाट से उठकर मोहन पास में भौंकती अपनी ही कुतिया से बातें कर रहा था, थोड़ी ही देर में चुप होने के बाद पास में आकर काये काये करती , कूलती हुई, मोहन की चप्पल के पास में आ बैठी।

आ गयी मिल गयी तस्सली, ऐसे चिल्ला रही थी जैसे तेरे ससुराल से तुझे ज़बरदस्ती तेरे चाहने वाले लेने आ गए हो और तू जाना नहीं चाहती। जा अब क्यों आयी है यहाँ? मोहन की बड़ बड़ाती आवाज़ सुनकर वो उसके पैर से जाकर चिपकने लगी और खुद को रगड़ते हुए अपना स्नेह दिखाने लगी।

हाँ ठीक हैं चल आ जा अब कुछ नहीं कहूँगा पर सोने तो दे अभी ४ ही तो बजे है और खासते हुए खाट पर अपनी तकिया को सरका कर लेट गया। करीब २ घंटे हो गए होंगे पर मोहन की आँख ही नहीं खुली आज तो।

तभी अंदर से हस्ती हुई रिंकी दौड़ते आयी और मोहन के पेट पर जाकर कूद पड़ी ,मोहन की तो मानो जैसे जान निकल गयी हो, हाँ उम्र भी तो हो गयी थी ७४ की उसके मुँह से गाली ही निकलने वाली थी पर चादर मुँह से हटाते ही उसने जब रिंकी का चेहरा देखा, तो वो चुप रह गया और बोला, “आ जा मेरा बच्चा आज स्कूल नहीं जाना है क्या?”

रिंकी खाट पर बची हुयी जगह पर अपने बैठने लायक जगह बनाकर बोली, “दादा देखो न मम्मी रोज़ के रोज़ स्कूल भेज देती हैं। मै अभी ७ साल की ही तो हूँ और ७ दिन स्कूल।”

रिंकी की मासूमियत उसके चेहरे पर झलक रही थी जिसे देख मोहन मुस्कुराया और बोला,”बस कुछ दिन की ही तो बात है फिर गर्मी की छुट्टियाँ चालू हो जायेगी। फिर मैं तुम्हें खेत पर ले जाया करूँगा बेल गाड़ी पर बैठा कर। बड़े समझाने के बाद रिंकी मान तो गई, पर उसने एक शर्त रखी कि मैं आज नहाउंगी नहीं और मोहन ने हां भी भर दी।

रिंकी खुशी से उठी और दौड़ते हुये लंगड़ी खेलते खेलते घर के दरवाज़े की तरफ चली। मोहन ने ऊंची आवाज़ लगाकर, “अरे रिंकी बेटा अपनी मम्मी सुनीता से कहना कि दादा को चाय भिजवा दे।”

रिंकी वही से भागते भागते हाँ कह कर घर में घुस गयी।

गाँव कह लो या देहात ज्यादा लोग नहीं रहते थे यहाँ। करीब ४-५ परिवार थे, जब मोहन अपने पापा मम्मी के साथ आया था, धीरे धीरे करके कुछ ज़मीन बनाई, घर बनाया और खेती करने लगा फिर जब से उसका बेटा धर्मेंद्र बड़ा हुआ तो सारी फसल और घर का सब वही देखने लगा।

अंदर से धर्मेंद्र आया जिसने तौलिया लपेट रखी थी और बनियान पहने एक हाथ में रिंकी को लिए स्कूल की ड्रेस और दूसरे हाथ में चाय का गिलास।

और पास मे ही आकर खड़ा हो गया, मोहन ने देखा तो खाट पर उठकर अपने पैरो से जमीन पर रात को उतारी हुयी चप्पल टटोलने लगा। धर्मेंद्र ने चाय को हाथ मे दिया और चप्पल अपने पैरो से मोहन के पैर के पास करते हुए वही खाट पर बैठ गया।

मोहन की खाट घर के सामने खाली पड़े खेत मे रहती थी, पर अब वहां सूरज की पहली किरण पहुंचने लगी और महीना चैत का था इसलिए गर्मी भी दे रही थी। धर्मेंद्र ने रिंकी को नीचे उतारा और चादर की घरी करने लगा।

“अच्छा बेटा तो अपन कब चल रहे? थ्रेसिंग करवाने, अपनी फसल की?”, मोहन ने चाय का पहला घूंठ लेते हुए बोला।

“बस ट्रेक्टर मिल जाए।”

“बोल-कर रखा है, २-४ लोगो से, पर पैसा बहुत मांग रहे हैं। अपने फूफा के दोस्त के पास है, एक ट्रेक्टर उनसे बात की तो बोले, अपन को ठीक ठाक लगा लेंगे,” धर्मेंद्र ने चादर और तकिया को एक जगह रखकर जवाब दिया।

“चलो ठीक है, इस बार तो तनिक सही दिख रही फसल, पानी कम गिरा पर अपने कुआ ने बचा लिया नहीं तो क्या होता अपना…” मोहन ने रिंकी के सर पर हाथ फिराते हुए धर्मेंद्र से बोला।

कपड़े और खाट उठाकर धर्मेंद्र ने कहा, “माता की कृपा रही तो सब सही होगा और कहा चलो पापा जाओ मुँह हाथ धो आओ मैं रिंकी को स्कूल छोड़कर आता हूँ।” और वहां से निकल गया।

सूरज का आक्रोश दिन के दिन बढ़ता जा रहा था, पर धर्मेंद्र की ढेर लगी फसल, खेत पर इंतज़ार करते हुए वक़्त बिता रही थी।

अभी कुछ दिनों के लिए धर्मेंद्र पास वाले सरकारी रोड को बनाने में मज़दूरी करने लगा, जिससे कुछ तो ख़र्चा चले। और आज दो दिन ही हुए थे कि खबर आयी कि सुनीता के मायके से कोई आया है।

सुनीता तो जैसे ख़ुशी से फूले नहीं समा रही थी, उसे खुश देख धर्मेंद्र ने उससे कहा, “तू आधी दिन की छुट्टी लेकर घर चली जा” वो भागते हुए हाँफते-हाँफते घर पहुंची, उसने देखा कि सालों बाद आज घर में सुनीता का भाई आया हुआ है और दूसरी रेल से उसकी छोटी बहन भी सबसे मिलने आ गई।

रात तक सब के ठहाको से घर में रौनक सी फैल रही थी, सुबह हुयी और रोज़ की तरह धर्मेंद्र ने खाते वक़्त बोला, “रोटी खाने आऊंगा जब मैं दुपहरी में, तब मेरे साथ चलना”, सुनीता ने कुछ नहीं कहा और धर्मेंद्र खाना खाके वहां से काम पर चला गया।

यहाँ तीनो भाई बहन खूब मस्ती करते रहे, छोटी बहन बोली चलो दीदी कहीं बाहर घूम के आते हैं। सुनीता को उसका प्रस्ताव पसंद आया, पर उसने बोला, “तुम्हारे जीजा जी से पूछना पड़ेगा। अभी आएँगे वो खाने में पूछ कर बताती हूँ।“

और उसने अपनी तैयारी शुरू कर दी ,धर्मेंद्र आया तो सुनीता ने बड़े प्यार से उसके सामने खाना परोसा और वही बैठ गयी। सुनीता बैठी तो थी सामने पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ कहने की और देखते देखते धर्मेंद्र का खाना हो गया और सुनीता से वो चलने बोला, सुनीता भी तैयार हो गयी पर अब भी वो हिम्मत नहीं जुटा पायी कि कैसे कहे, इतने में सुनीता की बहन ने इशारा किया तो सुनीता ने बोल ही दिया, “सुनो अगर में आज नहीं जाऊँ तो?”

धर्मेंद्र ने गुस्से में बोला, “क्यों?”

सुनीता के मुँह से कांपते हुए निकला, “”मने जाना था, तालाब और मंदिर देखने के लिए…”
धर्मेंद्र को पता नहीं क्यों और कैसे इतना गुस्सा आया और जाकर वो एक पतली सी लकड़ी लेकर आया और बिना कुछ सोचे समझे सुनीता को पीटना चालू कर दिया, उसे मारता देख उसका भाई आया और धर्मेंद्र को पकड़ लिया वहां सुनीता को भी उठा कर छोटी बहन थोड़ा दूर ले गई।

धर्मेंद्र ने लकड़ी को फेंकते हुए कहा, “तू बस घूम, आज के बाद तू नहीं जियेगी, काम पर जितना मैं कमाऊंगा, उसमे जो भी आएगा वो पूरे घर को खिलाऊंगा और बोलते बोलते रोने लगा उसके आँसू आँखों से टपकने लगे और अपनी हथेली आगे खोलकर बोला, “ये मेरे हाथ में छाले पड़ रहे है वो इस लिए नहीं कि मुझसे काम नहीं होता वो इसलिए कि मैं रोज़ दो आदमी का काम करता हूँ। पूछो अपनी बहन से कि मैं इसे थोड़ा भी काम करने देता हूँ क्या? मैं तो बस इसे इसलिए ले जाता था कि मेरा मन लगा रहे और मेरी आँखों के सामने रहे तो थकावट न हो पर, तुझे घूमने जाना है। जाते जाते वो बोल कर गया कि आज के बाद तू मेरे साथ वहां काम करने आयी तो मेरा मरा मुँह देखेगी” और ताव में दरवाज़ा पटक कर आँसू पोछते हुए चला गया, यहाँ सुनीता का भी हाल बुरा था रो रो कर।

दोनों भाई बहन को अलविदा करके रात को धर्मेंद्र का इंतज़ार करने लगी, इतना क्रोध भरा धर्मेंद्र सुनीता ने पहले कभी नहीं देखा था, क्या ये चिंता थी उसे अपने घर की या प्यार था सुनीता के प्रीति जो गुस्सा बनकर आज दिन मे निकला था।

वहां धर्मेंद्र का भी मन नहीं लग रहा था अपनी नाज़ुक सी प्यारी बीवी पर हाथ उठाकर, कई बार वो अपनी हथेली को देखकर सोचता की पटरी पर जाकर रख दू इन्हे, जिनसे मैंने सुनीता को मारा। फिर ख्याल करता अगर ऐसा किया तो उन्हें ख़ुशियाँ कौन दे पायेगा और उस पगली को तो सिर्फ एक गुड़ की डली में खुश हो जाना है।
सुनीता ने धर्मेंद्र को आते देखा तो खाना लगा दिया कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था और जाकर दोनों अपने अपने बिस्तर पर लेट गए सुनीता का मन नहीं माना, तो आकर धर्मेंद्र के पैर दबाने लगी उसे पैर दबाते देख उसने चादर से अपना मुँह ढक लिया और रोने लगा, वहां सुनीता के भी आँसू ऐसे ही निकल रहे थे।

अब ये किस्सा रोज़ का हो गया बिना संवाद के दोनों का प्यार और माफ़ी आँसूओ से टपकता रहा, दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे, पर छिप-छिप कर रोते है, ये दोनों जानते थे। किसीकी भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि शुरुवात कैसे करे या पुराना ख़तम कैसे करे।

बस ऐसे ही वक़्त गुज़र रहा था और तलाश थी तो एक थ्रेसर की जो करीब १० दिन से ज्यादा हो गए होंगे तबसे चल रही थी।

कुछ समय और निकला तो एक दिन रोटी बनाने वाले घर में रिंकी के रोने की आवाज़ सुनकर धर्मेंद्र भीतर पहुंचा और बोला, “क्या हुआ मेरी रानी को”

इससे पहले रिंकी रोते हुए कुछ बोलती सुनीता फटाक से बोली, “हाँ चिपका कर रखो अपनी बेटी को अपनी छाती से इतनी प्यारी हैं तो, क्यों नहीं ले आते उसके लिए दूध और शक्कर, तुम्हें खबर हो घर की तब न, ऐसे खुश हो रहे है अपनी फसल का सोच सोच कर जैसे बहुत बड़े धन्ना सेठ बनने वाले हो और घर में कितने दिनों से राशन नहीं है इसकी कोई खबर नहीं।” कहते कहते सुनीता रोने लगी और दरवाजे से सट कर सरकते हुए नीचे बैठ गयी और बोली, “तुम्हे पता है क्या? वो क्यों रो रही है वो इसलिए रो रही है की एक हफ्ते से बिना शक्कर के उस पर दूध नहीं पिया जा रहा, रोज़ रोज़ नई कहानी सुनकर उसे मना लेती थी पर अब क्या सुनाऊ या मैं ही मर जाऊँ। सर को पीटने लगी और बोली बचा हुआ गेहूं भी दुकान पर बेच कर मैं तुम सबके लिए तरकारी बनाती रही इसलिए पता नहीं चला न।”

ये लो और ये भी लो सुनीता गुस्से में उठकर वहां पड़े खाली आटा के डिब्बे और दाल के डब्बो को धर्मेंद्र के सामने फेंकने लगी। धर्मेंद्र ने तुरंत रिंकी को अपनी गोद में लिया की कहीं कोई डिब्बा उसको न लग जाए ये सब देखकर रिंकी और भी चीख चीख कर रोने लगी।

थोड़ी देर खड़े रहकर वो आज सुनीता का वो रूप देख रहा था जिसमे रिंकी की मम्मी के आँसू छलक रहे थे।अब उसने सुनीता को अनदेखा किया और पास में पड़े थैले को उठाकर बाहर की तरफ चला गया उसे देख सुनीता फट से उठ खड़ी हो गयी और आँसू पोछती हुयी दरवाजे से दो कदम बाहर निकल कर अपनी साड़ी के पल्लू को सँभालने लगी, वो उसको तब तक देखती रही जब तक की वो ओझल न हो गया।

सुनीता को अपने किये हुए बर्ताव के लिए पछतावा तो था पर वो करती भी तो क्या? वो भूखी रह सकती थी पर सवाल यहाँ उसकी औलाद का था। धर्मेंद्र के हाथ में थैला देख सुनीता को महसूस तो हुआ कि वो दुकान जाएगा पर कैसे लाएगा पैसे या गेहूं का दाना कुछ भी तो नहीं हैं, साहू कार को देने के लिए यही व्याकुलता उसे सता रही थी।

वहां धर्मेंद्र भी दुकान पर पंहुचा तो साहू कार ने उसका खाली थैला देखकर टोंट कसते हुए कहा, “क्या भाई कुछ दिनों में तो तुम अमीर होने वाले हो? सुना है इस बार की तुम्हारी फसल अच्छी हुई है और तुम क्या ये खाली थैला लेकर घूम रहे हो? क्या चाहिए बताओ पैसे की चिंता मत करो भाई, दे देना बाद में तुम कौन सा गाँव छोड़ कर भागे जा रहे हो इतना सुन कर धर्मेंद्र चौक गया और वहां साहू के साथ खड़ा एक और गाँव निवासी दोनों हसने लगे।

तभी वो बोला साहू जी धर्मेंद्र की तो फसल मस्त हुई हैं और होती भी क्यों नहीं सरकार ने जो खेत के ऊपर से बिजली की लाइन निकाली है लाइट मिल रही है पानी तो है ही कुए में बस और क्या चाहिए और ऐसा कहते हुए चला गया।

उसको जाते देख दूकानदार बोला देखो भाई अच्छी बात है कि तुम्हारी फसल अच्छी हो गयी पर पैसे अगर वक़्त से नहीं मिले तो तुम्हारी एक भैस छोर लाएंगे हम। आगे का तुम सोच लो ,धर्मेंद्र ने मुस्कुराते हुए थैला आगे किया और कहा साहू जी चिंता मत करो।

दुकानदार से ज़रूरत का सामान खरीदकर धर्मेंद्र घर पंहुचा और भरा थैला आगे करते हुए सुनीता से बोला, “ ले रे पगली आज पूड़ी बना और रिंकी बेटा ये लो शक्कर अभी तुम रोज मीठा दूध पीना। सुनीता धर्मेंद्र के चेहरे को ध्यान से देख रही थी।”

“तभी धर्मेंद्र बोला काये री क्या देख रही हैं, चोरी करके नहीं लाया न डाका डालके”, सुनीता ने मस्ती भरे स्वर में नाक सुकोड कर बोला, “अच्छा फिर किसने दान कर दिया”

“ ..दान …..दान…….. रुक अभी बताता हूँ दान किया कि कमाई का लाया, रिंकी बच्चा ज़रा देखो तुम्हारे दादा तुम्हें बुला रहे है”

रिंकी हसते हुए बाहर निकली और चिल्लाते हुए बोलती गई कि दादा देखो पापा शक्कर लाये हैं उसके जाते ही धर्मेंद्र ने दरवाजे बंद कर दिए और सुनीता के करीब जाकर उसका दाया हाथ मरोड़कर पीछे कर दिया ,सुनीता कराहती हुयी बोली, “अरे छोड़ो न लग रही है। अभी धर्मेंद्र उसके और करीब आता जा रहा था, और सुनीता अपने कदमों को पीछे पीछे करती जा रही थी। यहाँ धरेंद्र भी उसके कदमों से साथ ही उसके साथ चल रहा था और जाकर दोनों दीवार से टकरा गए।

धर्मेंद्र और सुनीता अब इतने करीब थे कि मानो जैसे साँसों का संगम हो रहा हो। सांसे कौन सी किसकी है ये पता कर पाना मुश्किल था। धर्मेंद्र ने अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला और उसमे से एक पुड़िया निकाली और बोला ये ले तेरे लिए।

सुनीता का चेहरा पूरा लाल हो चुका था और होता भी क्यों नहीं भट्टी सी जलती हुयी दोनों की साँसे चेहरा लाल कर ही देती। उसने पुड़िया खोलकर देखा तो उसमे एक गुड़ की डली थी, उसको देख सुनीता की आँखे मानो कमल की तरह एक ही पल में खिल गयी और वो ख़ुशी के मारे धर्मेंद्र के गले लग गई।

गले लगते ही धर्मेंद्र ने उसे कस के भींच लिया और उसके काँधे पर चूमते हुए उसके कान में बोला, “तुझे गुड़ बहुत पसंद है, मुझे मालूम है और ये भी मालूम है कि तूने सालो से नहीं खाया।”
धर्मेंद्र की बातें सुनते हुए सुनीता रो पड़ी। दरवाजे खुलने की आवाज़ में अचानक दोनों अलग अलग हो गए और घबरा गए तभी अपनी नन्ही सी आवाज़ में रिंकी बोली, “पापा दादा तो बोल रहे मैंने नहीं बुलाया” उसकी बातें सुनकर सुनीता ने अपने आँसू पोंछे और दोनों हसने लगे।

आज की रात शायद कुछ अच्छा लेकर आने वाली थी और आखिर कार धर्मेंद्र को ट्रैक्टर मिल ही गया और उससे बोला गया कि ३ दिन में आएगा और कहा कि करीब २ घंटे लगेंगे पूरी फसल की थ्रशिंग होने में और घंटे के हिसाब से पैसा लगेगा सब कुछ तय हो गया और सब सो गए हमेशा की तरह मोहन अपनी खाट पर रिंकी को कहानी सुनाकर सो गए।

आज रात फिर भूरी चिल्ला रही थी पर मोहन आज उठने वालो में से नहीं था पर थोड़ी ही देर में दरवाजे को पीटने की आवाज़ आयी और आवाज़ इतनी तेज थी कि आस पड़ोस के काफी लोग उठ गए धर्मेंद्र भी बाहर निकल के आया और मोहन भी अपने पैरो में आधी अधूरी चप्पल फसा कर खचोरते हुए दरवाज़े के पास पंहुचा।

मोहन बोला, “क्या हुआ है रे, केतन बेटा क्यों चिल्ला रहा है, दारु पी कर आया है क्या?”

केतन कांपते हुए बोला चाचा ,धर्मेंद्र तुम्हारी फसल के ऊपर बिजली के तार गिर गए जिससे पूरी फसल में आग लग गयी और वो पेड़ भी जल गया जिसके नीचे फसल रखी थी।”

इतना सुनते ही सबके कान सुन्न रह गए धर्मेंद्र ने जैसे ही सुना वो खेत की तरफ भागा उसके पीछे सुनीता भी भागी पर २ महीने के पेट से होने की वजह से वो ज्यादा नहीं चल पायी और बेहोश होकर गिर पड़ी वहां आज धर्मेंद्र ऐसे भाग रहा था जैसे उसमे किसी देवता की शक्ति आ गयी हो और चीख-चीख कर रोता जा रहा था।

अभी करीब पूरे गाँव में ये खबर फ़ैल चुकी थी, तो कोई साइकिल से तो कोई पैदल ही उसके खेत पर जाने लगे। धर्मेंद्र पहुँचकर अपनी किस्मत, अपनी ख़ुशियाँ, अपनी मेहनत सब को वहां जलते देख रहा था। उस आग से उठते धुएँ में उसे अपनी बेटी को रोते और बाप को बीमार एक खाट पर भूख से लड़ता देख रहा था, उसकी आँखों के सामने वो तस्वीर आ रही थी, जिसमे साहूकार उसकी बीवी और उसके बच्चे को रुला रहे है।

करीब १०-1५ मिनट में वहां पूरा गाँव इकट्ठा हो गया था और सबकी आँखें खुली रह गयी। मोहन वही नीचे गिर पड़ा। जिस पेड़ के एक तरफ उसकी फसल जल रही थी उसके दूसरी तरह एक डाल पर तौलिये से बंधा धर्मेंद्र का शरीर लटक रहा था। हार गया जंग धर्मेंद्र जिंदगी की… उसकी छोटी सी ही तो ख्वाहिशें थी।

सरकार ने कुछ पैसे तो दे दिए सुनीता को जिसमे से पूरा का पूरा मोहन के इलाज़ पर खर्च हो जाता है, और कुछ बचा हुआ रिंकी की पढ़ाई पर। अब सुनीता को मजदूरी करने जाना पड़ता हैं और जाकर काम करना भी पड़ता है, पता नहीं कि दिन में कितनी बार सुनीता रोती होगी और हाँ दिन में एक बार वो जाकर कोने में उस पुड़िया को खोलकर ज़रूर देखती हैं जिसमे धर्मेंद्र ने उसे गुड़ की एक डली दी थी।
साल निकल रहे हैं और वक़्त के साथ गुड़ की डली भी कम हो रही हैं। धर्मेंद्र के छोटे बच्चे को भी गुड़ पसंद हैं और सुनीता उसको खरीद कर लाती भी हैं, पर वो उस गुड़ को किसी को हाँथ नहीं लगाने देती।

हाँ वो बात अलग है कि डली को चीटियों से बचाना मुश्किल होता है सुनीता के लिए, पर वो कोशिश में लगी है कि कम से कम उसके आँसू उसके सामने ही गिरे। सरकार ने तो अपनी औकात के हिसाब से जितना दे सकती थी सब दे दिया उम्मीद है कि कुछ ऐसा हो जिससे उसकी पुड़िया ही सही पर रातो रात बढ़ती जाए और सुनीता की हिम्मत बढ़ाये।

 

-हृदेश कुमार

 

Hridesh Kumar
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