Good Bye | Mid Night Diary | Amrit Raj

गुड बाई! | अमृत

लैपटॉप बैग ले लिया, मोबाइल को जेब मे डाल लिया, जूते पहने, हमेशा की तरह फीते खुले ही थे! मैं बस निकलने को ही था, कि ध्यान आया, वपास जा शर्ट चेंज की और काली वाली शर्ट पहन ली, उसने कहा था कभी

“काली शर्ट में तुम्हे देखना, पता है कैसा लगता है?”
“नही, बताओ”
“जैसे स्याह आसमान में चमकता कोई सितारा हो, जिसे में घंटो निहार सकती हूँ, और वो मुझे देख बस टिमटिमाता रहता है”

पार्क के बाहर गाड़ी पार्क कर, मैं अंदर दाखिल हुआ!

धूप का रंग पीला से अब लाल हो चुका था! पेड़ो के साए दिन भर की थकान के बाद जमीन पे पसर गए थे!

कोने की वो बेंच उबासियाँ ले रही थी, मैंने खुद को वहीं टिका दिया! आज बस सब खत्म कर दूँगा, यूँ घुटने का महत्व ही क्या है, आज तो बस कह देना है! खुद को आनेवाले पल के लिए तैयार कर रहा था, जाने कितने ही बार पहले भी कर चुका था! हर बार वो आती थी और बस…

वो होता है न आप रात भर पढ़ो और एग्जाम में क्वेश्चन सारे सिलेबस के बाहर से, सारी तैयारी हवा हो जाती है! वो मेरे सिलेबस के बाहर ही थी! पर आखिर कब तक चलेगा यूँ, मैंने उसको बता तो दिया है निशा के बारे में, फिर भी वो कुछ पूछती ही नही, आती है मिलती है पर कुछ कहती नही, मैं बस इंतजार करता हूँ कभी तो कुछ पूछे और मैं कह दूँ…

कह दूँ मैं की अब उसके कॉल का वेट नही करता, सुबह उठकर आनेवाला पहला ख्याल अब उसका नही! चाय में अब उसकी उंगलियों में फंसी चमच्च के नाचने की परवाह नही! भूल चुका हूँ सर पे हाथ फेरना उसका, उसकी जुल्फों की छलनी से छनकर आती धूप का स्वाद भी भूल चुका हूँ!

किचन स्लैब के नजदीक मसाले को उछलती वो, उसकी कमर पे काटी मेरी चिकोटी, और फिर पूरे घर मे उसका मेरे पीछे पीछे घूमना, तकियों की बमबारी, महसूस करता हूँ क्या…..नही…नही..नही महसूस करता मैं जरा भी!

बेंच अनायास ही चुभने लगी है, शायद इंतजार की कीलें है!

उठकर थोड़ा आगे बढ़ गया, सूरज धीरे धीरे पेड़ो की ओट में जा रहा था!

मरीना बीच की वो शाम, सूरज जब समंदर पीने नीचे उतर रहा था! हम दोनों लहरों के संग छुआ छूई खेल रहे थे! और फिर जब वो ऊंची सी लहर पीछे से आ उसकी कमर को छू गयी थी!

उसकी वो आँखें, क्या मुझे कुछ याद है…नही…नही यार आज तो बस खत्म करना है किस्सा! कहूँगा एक गुड बाय और बस….निशा…हाँ वही चाहिए मुझे…!

गेट से वो अंदर दाखिल हुई, पीली साड़ी मेरी फेवरिट पहन कर आई है! वो मुझे अब भी कितना प्यार करती है न! कितनी मासूम सी लग रही है, जैसे पल्लू में धूप लायी हो…हर बार मेरे बुलाने पर आ जाती है, बिना कुछ कहे ही ,जबकि मैंने ये तक बता दिया है कि मैं और निशा फिजिकल भी हो चुके है, नही..इतना प्यार मुझे कोई नही कर सकता! इस पगली को तो मालूम भी नही, मैं हर बार इसे बाय कहने को बुलाता हूँ, वो अलग बात है कि कह नही पाता!

इसको बाय कहना ….न…नही…सब ठीक ही कर लेता हूँ, निशा को कह दूँगा, कि अब हमारे बीच सब ठीक हो गया है, इसे कह देता हूँ निशा को छोड़ दिया! हाँ… यही सही है…

“हाई”
“हाई”
“सॉरी मुझे देर हो गई”
“कोई बात नही”

“वो दरअसल मैं अरुण के साथ थी तो देर हो गई, एक्चुअली मैं तुम्हे यही बताने आयी हूँ, मैं अरुण के साथ मूव कर रही हूँ, आखिर कब तक तुम्हारे सर पर पड़ी रहूँगी! तुम तो मुझे पहले ही छोड़ चुके हो, मैं ही नही समझती थी अब तक, सोचती थी शायद फिर से सब कुछ ठीक…पागल हूँ मैं, चलो फाइनली तुम्हे आजाद कर रही हूँ, अब तुम्हे मेरा कॉल उठाने की जरूरत नही होगी, सुबह सुबह तुम्हे उठाऊँगी भी नही,चलो टेक केअर..”

वो मेरे गले लगी, जाने को हुई फिर मुड़ी…
“राज”
“हाँ”
“गुड बाय”….

शाम धीरे धीरे गेट से बाहर चली गयी! उस पार्क में अब मेरे साथ बैठी थी, रात, लंबी ..काली ..स्याह रात….जिसपे उजले चॉक से लिख दिया था उसने…

गुड बाय…

-अमृत

 

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