Ghazal ho Tum | Mid Night Diary | Vinay Kumar

ग़ज़ल हो तुम | विनय कुमार

उस रोज जब उसने मझसे पूछा की अब क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए?
जब मेरी ख़ामोशी
मेरे दिल की धड़कनो से बात करती है

जब मेरी खुली आँखे
तुम्हारे धुंधलाते चेहरे का दीदार करती है
जब मेरा ये बदन
करवटें बदल बदल कर बैचैन करता है

जब मेरी जुबान
तुम्हारे लिए गीत गुन गुनाति है
जब मेरे ये अश्क़
न जाने किस नदी को मिलने जाते है

जब मेरे ये होंठ
तुम्हारी यादों को चूमते नज़र आते है
जब मेरा ये मन
तुमको मुझमे टटोलने की कोशिश करता है
उस न बीतने वाली रात की
ग़ज़ल हो तुम

– विनय कुमार

Vinay Kumar
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